BSP की जमीन पर दशकों पुराने कब्जे का दावा खत्म: बिजली बिल-निर्माण से नहीं मिलता कानूनी अधिकार
खुर्सीपार भिलाई में भिलाई इस्पात संयंत्र की व्यावसायिक जमीन पर काबिज कारोबारियों को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से बड़ा झटका लगा है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मूल आवंटन शर्तों के उल्लंघन में किया गया कब्जा, चाहे वह कितना भी पुराना क्यों न हो, सार्वजनिक संपत्ति पर कोई वैध अधिकार नहीं प्रदान करता.
बिलासपुर । संवाददातता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भिलाई के खुर्सीपार क्षेत्र में भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) की जमीन से बेदखली की कार्रवाई को चुनौती देने वाली दुकानदारों और व्यावसायिक संचालकों की सभी 9 याचिकाओं को खारिज कर दिया है. अदालत ने अपने महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी सार्वजनिक परिसर पर लंबे समय से कब्जा होना, वहां पक्के निर्माण कर लेना अथवा बिजली बिल और अन्य शुल्कों का नियमित भुगतान कर देना उस संपत्ति पर मालिकाना हक या कानूनी रूप से लागू करने योग्य अधिकार का आधार नहीं बन सकता.
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने 3 नवंबर 2026 को इस मामले में अपना आदेश सुनाते हुए कहा कि जिन लोगों ने मूल आवंटन समझौते के तहत प्रतिबंधित सौदों या हस्तांतरण के जरिए कब्जा हासिल किया है, वे उस संपत्ति पर बने रहने का कोई स्वतंत्र कानूनी दावा पेश नहीं कर सकते. इसके साथ ही अदालत ने एक बीएसपी अधिकारी के खिलाफ दायर अवमानना याचिका को भी खारिज कर दिया, क्योंकि इसमें अदालत के पुराने आदेश के जानबूझकर किए गए उल्लंघन का कोई ठोस सबूत नहीं पाया गया.
जानिए कैसे शुरू हुआ था जी.ई. रोड खुर्सीपार की बीएसपी जमीन का यह विवाद
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, भिलाई इस्पात संयंत्र ने वर्ष 1976 में खुर्सीपार क्षेत्र में जी.ई. रोड के किनारे व्यावसायिक भूखंडों का आवंटन किया था. मूल आवंटन समझौतों में यह स्पष्ट शर्त शामिल थी कि आवंटित परिसरों को किसी अन्य को स्थानांतरित नहीं किया जाएगा, न ही उन्हें उप-किराए (सबलेट) पर दिया जाएगा और न ही ऐसी कोई साझेदारी बनाई जाएगी जिससे कब्जा किसी तीसरे व्यक्ति के पास चला जाए.
समय बीतने के साथ, मूल आवंटियों से अन्य व्यक्तियों और व्यावसायिक संस्थाओं ने इन भूखंडों का भौतिक कब्जा ले लिया और वहां अपनी दुकानें तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठान खोलकर संचालन शुरू कर दिया. याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया था कि वे इन स्थानों पर कई दशकों से व्यापार कर रहे हैं और लगातार किराया, लाइसेंस शुल्क, बिजली बिल तथा संपत्ति से जुड़े अन्य बकायों का भुगतान करते आ रहे हैं.
वहीं, बीएसपी का रुख था कि मूल आवंटन शर्तें इस तरह के हस्तांतरण की अनुमति नहीं देती थीं, इसलिए मूल आवंटियों के जरिए कब्जा पाने वाले लोग महज व्यापार चलाने के आधार पर इस्पात संयंत्र के खिलाफ कोई अधिकार नहीं मांग सकते.
याचिकाकर्ताओं के तर्क और सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत बेदखली की कार्रवाई
व्यापारियों ने बीएसपी के संपदा अधिकारी (Estate Officer) द्वारा सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत पारित बेदखली के आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. याचिकाओं में कहा गया था कि बेदखली के ये आदेश कई साल पुराने हैं और इतने लंबे समय के बाद इन्हें लागू नहीं किया जाना चाहिए. कुछ कारोबारियों ने खुद को वैध कब्जाधारी बताते हुए तर्क दिया कि उनके द्वारा किए गए भारी निवेश, पक्के निर्माण और दशकों पुराने कब्जे पर विचार किया जाना चाहिए.
अदालत ने इन तर्कों की समीक्षा करते हुए ध्यान दिलाया कि संपदा अधिकारी द्वारा वर्ष 2004 और 2010 में ही बेदखली के आदेश पारित किए जा चुके थे, लेकिन कब्जाधारियों ने उन आदेशों को वैधानिक प्रक्रिया के तहत संबंधित अपीलीय फोरम के समक्ष सफलतापूर्वक चुनौती नहीं दी थी.
उच्च न्यायालय की दोहरी टिप्पणी: निर्माण और बिल भुगतान से नहीं मिलता मालिकाना हक
कारोबारियों की मुख्य दलीलों को नकारते हुए न्यायमूर्ति प्रसाद ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा दिया गया कोई भी स्वतंत्र अधिकार या स्वत्व (टाइटल) साबित करने में पूरी तरह विफल रहे हैं. अदालत ने कहा कि कब्जाधारियों का दावा मूल आवंटियों के साथ किए गए उन लेन-देन पर टिका है, जिन्हें मूल अनुबंध में स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया था.
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि पक्का निर्माण, बिजली कनेक्शन या शुल्कों का भुगतान केवल यह दर्शा सकता है कि कोई व्यक्ति कितने समय से वहां रह रहा है, लेकिन यह स्थिति किसी सार्वजनिक संपत्ति पर कब्जा करने के कानूनी अधिकार का स्थान नहीं ले सकती. इसके अलावा, केवल समय बीत जाने से कोई अनधिकृत कब्जा वैध नहीं हो जाता और 1971 का सार्वजनिक परिसर अधिनियम ऐसी सार्वजनिक संपत्तियों को अनधिकृत लोगों से वापस लेने का स्पष्ट वैधानिक जरिया प्रदान करता है.
बीएसपी अधिकारी के खिलाफ दायर अवमानना याचिका भी खारिज
मुख्य याचिकाओं के साथ ही अदालत ने आई.ए. धास द्वारा एक बीएसपी अधिकारी के खिलाफ दायर अवमानना याचिका (क्रमांक 512/2022) पर भी विचार किया. इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि उच्च न्यायालय द्वारा 8 अप्रैल 2022 को यथास्थिति (स्टैटस को) बनाए रखने के निर्देश के बावजूद बीएसपी अधिकारियों ने 19 अप्रैल 2022 को उन्हें परिसर से बेदखल कर दिया था.
मामले की जांच के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से अंतरिम आदेश के जानबूझकर या अवहेलनापूर्वक उल्लंघन का तत्व स्थापित नहीं होता है. अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अवमानना की कार्रवाई का उपयोग विवादित स्वामित्व दावों को तय करने या सार्वजनिक परिसरों में रहने का नया अधिकार हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता. इसी आधार पर अवमानना याचिका को भी अन्य रिट याचिकाओं के साथ समाप्त कर दिया गया.
उच्च न्यायालय का यह फैसला भौतिक कब्जे और सार्वजनिक संपत्ति पर वैध कानूनी अधिकार के बीच के अंतर को पूरी तरह स्पष्ट करता है, जिसके बाद प्रभावित व्यवसायों के लिए बेदखली की कार्रवाई से राहत पाने का कोई कानूनी रास्ता नहीं बचा है.