हाईकोर्ट का कस्टडी पर फैसला: शिक्षक होना बच्चे की कस्टडी का आधार नहीं
बलौदाबाजार के एक मामले में हाईकोर्ट ने मां के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि बच्चे की परवरिश और पढ़ाई सही तरीके से हो रही है, तो केवल बेहतर शिक्षा देने का दावा कर उसे मां से अलग नहीं किया जा सकता.
बिलासपुर । संवाददाता: बच्चे के अधिकारों और कल्याण को माता-पिता के कानूनी दावों से ऊपर रखते हुए उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच (जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मां के पास रह रहे बच्चे की देखरेख और शिक्षा में कोई कमी नहीं पाई जाती, तो उसे मौजूदा स्थिति से हटाना अनुचित है.
केवल पिता का शिक्षक होना या उसकी बेहतर शैक्षणिक व आर्थिक क्षमता कस्टडी हस्तांतरित करने की वजह नहीं बन सकती.
बलौदाबाजार जिले से जुड़े इस मामले में वर्ष 2015 में विवाहित दंपती के बीच विवाद के बाद तलाक हो गया था. इसके बाद पति ने दूसरा विवाह कर लिया, जबकि बेटा अपनी मां के साथ ही रह रहा था. पिता ने बाद में फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर संयुक्त परिवार का हवाला दिया और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई कराने का तर्क देकर बेटे की कस्टडी मांगी.
वहीं, कोर्ट में सात वर्षीय बालक ने पिता के साथ जाने की कोई इच्छा नहीं दिखाई और न ही उनकी तरफ देखा, जिसके आधार पर फैमिली कोर्ट ने याचिका निरस्त कर दी थी. इसके खिलाफ पिता ने हाईकोर्ट का रुख किया था.
मामले की सुनवाई के दौरान मां ने स्कूल फीस की रसीदें प्रस्तुत कर साबित किया कि कक्षा दूसरी में पढ़ रहा बच्चा अच्छे संस्थान में शिक्षा प्राप्त कर रहा है. मां की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि पिता जन्म के बाद से बच्चे से मिलने नहीं आए और भरण-पोषण की राशि देने से बचने के लिए कस्टडी का दावा कर रहे हैं. क्रॉस एग्जामिनेशन में पिता ने अपने दूसरे विवाह की बात स्वीकार की थी.
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि गार्डियंस एंड वार्ड्स एक्ट 1890 की धारा 17 और हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट 1956 की धारा 13 के तहत बच्चे का हित ही सर्वोपरि है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'नील रतन कुंडू बनाम अभिजीत कुंडू' मामले में तय सिद्धांत का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि माता-पिता के अधिकारों से ज्यादा बच्चे का कल्याण मायने रखता है.
यद्यपि हाईकोर्ट ने कस्टडी मां के पास ही रखी है, लेकिन पिता को बच्चे से मिलने का अधिकार प्रदान किया गया है. पिता त्योहारों, बच्चे के जन्मदिन और स्कूल की लंबी छुट्टियों के दौरान मुलाकात कर सकेंगे. इसके लिए उन्हें पूर्व में मां को सूचित कर समय और सार्वजनिक स्थान तय करना होगा, और मां को भी इस अनुरोध पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दिया गया है.