छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी और कवि विश्वरंजन का निधन
रायपुर/पटना | संवाददाता: छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन का लंबी बीमारी के बाद रविवार को तड़के निधन हो गया. वे कुछ समय से अस्वस्थ थे और उनका इलाज पटना के मेदांता अस्पताल में चल रहा था.
हाल ही में उन्हें गंभीर कार्डियक समस्या के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
उनके निधन के साथ ही भारतीय पुलिस सेवा, प्रशासनिक जगत और हिंदी साहित्य की दुनिया ने एक ऐसी शख्सियत को खो दिया है, जिसने कठोर प्रशासनिक जिम्मेदारियों और संवेदनशील साहित्यिक चेतना के बीच दुर्लभ संतुलन स्थापित किया.
विरोधाभासों का सुंदर संगम: रणनीतिक अधिकारी और संवेदनशील कवि
1 अप्रैल 1952 को बिहार के गया में जन्मे विश्वरंजन का व्यक्तित्व अनेक परतों से बना था. एक ओर वे आंतरिक सुरक्षा की जटिल रणनीतियों से जुड़े अधिकारी थे, तो दूसरी ओर साहित्य और कला के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखने वाले रचनाकार.
वे प्रसिद्ध उर्दू शायर फ़िराक़ गोरखपुरी यानी रघुपति सहाय के नाती थे. यही पारिवारिक साहित्यिक विरासत उनके भीतर संवेदनशीलता और वैचारिक गहराई का स्रोत बनी.
उनके भीतर का कवि हमेशा सक्रिय रहा, वही कवि जिसने अपने संग्रह “स्वप्न का होना बेहद ज़रूरी” में लिखा कि मनुष्य के भीतर उम्मीद का एक उजाला हमेशा जीवित रहना चाहिए.
1973 बैच के आईपीएस अधिकारी
विश्वरंजन 1973 बैच के भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी थे. उन्होंने मध्य प्रदेश और बाद में छत्तीसगढ़ में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया.
उनकी सेवाएँ उज्जैन, ग्वालियर, बस्तर और रायपुर जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में रहीं, जहाँ कानून-व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा की परिस्थितियाँ अक्सर जटिल होती थीं.
केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने खुफिया और सुरक्षा से जुड़े कई संवेदनशील दायित्व निभाए. वे इंटेलिजेंस ब्यूरो में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे और बाद में अतिरिक्त निदेशक स्तर तक पहुँचे.
उन्हें जुलाई 2007 में छत्तीसगढ़ का पुलिस महानिदेशक नियुक्त किया गया और उन्होंने इस पद पर रहते हुए राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने का प्रयास किया. यह वह दौर था, जब पीयूसीएल से जुड़े डॉक्टर विनायक सेन को मई 2007 में गिरफ़्तार किए जाने के बाद से छत्तीसगढ़ सरकार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के निशाने पर थी.
इससे पहले सलवा जुड़ूम के कारण भी छत्तीसगढ़ के तत्कालीन डीजीपी ओपी राठौर की आलोचना हो रही थी. ऐसे समय में आईबी से बुलाकर छत्तीसगढ़ कैडर के विश्वरंजन को डीजीपी बनाया गया था.
उनके ही कार्यकाल में सलवा जुड़ूम नामक अभियान चरम पर पहुंचा और आदिवासियों को एसपीओ के नाम पर हथियार थमा दिए गए. इसके लिए विश्वरंजन की काफी आलोचना हुई.
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पदक
अपने लंबे और उल्लेखनीय सेवा जीवन में विश्वरंजन को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया.
उन्हें उत्कृष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक और प्रधानमंत्री पदक जैसे सम्मान प्राप्त हुए, जो उनकी पेशेवर ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण हैं.
आलोचक, कवि और चिंतक
प्रशासनिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद विश्वरंजन का साहित्य से रिश्ता कभी नहीं टूटा. हालांकि प्रशासनिक हलको में इसके लिए भी उनकी आलोचना हुई.
उन्होंने हिंदी के कई प्रमुख साहित्यकारों-अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, प्रमोद वर्मा पर लिखा, किताबें संपादित की.
उनके कविता संग्रह 'स्वप्न का होना बेहद ज़रूरी है' और 'आती है बहुत अंदर से आवाज़' मनुष्य की जद्दोजहद, आत्मसंवाद और आंतरिक शांति की तलाश के दस्तावेज़ माने जाते हैं.
उनकी कविताओं का अनुवाद तेलुगु, अंग्रेज़ी सहित कई भाषाओं में हुआ, जिससे उनकी रचनात्मकता की पहुँच दूर तक हुई.
वे चित्रकला और फोटोग्राफी में भी गहरी रुचि रखते थे. उन्होंने “प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान” की स्थापना कर छत्तीसगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई ऊर्जा दी. उनके कार्यकाल में यह संस्थान प्रदेश में साहित्यिक विमर्श और सांस्कृतिक संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच बना.