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मध्य-पूर्व में इजरायल का परमाणु एकाधिकार सुरक्षित करना चाहता है अमेरिका

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02 मार्च 2026, 07:17 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

तेहरान
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बीजिंग । डेस्क: बकौल ग्लोबल टाइम्स मध्य-पूर्व में जारी वर्तमान सैन्य संघर्ष और ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिका व इज़रायल के भीषण हमलों ने वाशिंगटन की उस दीर्घकालिक रणनीति को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य इस क्षेत्र में इज़रायल के परमाणु एकाधिकार को हर कीमत पर सुरक्षित रखना है. रविवार को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु की पुष्टि के बाद पैदा हुई अस्थिरता का लाभ उठाते हुए, अमेरिका और इज़रायल ने ईरान के महत्वपूर्ण परमाणु केंद्रों को निशाना बनाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वे क्षेत्र में किसी भी अन्य शक्ति को परमाणु रूप से सक्षम होते नहीं देख सकते. 


यह सैन्य कार्रवाई केवल सुरक्षा चिंताओं का परिणाम नहीं है, बल्कि एक गहरी वर्चस्ववादी नीति का हिस्सा है जहाँ 'परमाणु अप्रसार' के सिद्धांतों को केवल प्रतिद्वंद्वियों पर थोपा जाता है, जबकि सहयोगियों के परमाणु शस्त्रागार पर चुप्पी साध ली जाती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की इस नीति का मूल आधार यह है कि मध्य-पूर्व में कोई भी ऐसी शक्ति खड़ी न हो सके जो इज़रायल के रणनीतिक दबदबे को चुनौती दे सके, और ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस एकाधिकार के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है.

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इतिहास गवाह है कि अमेरिका का परमाणु प्रेम या घृणा किसी वैश्विक नियम पर नहीं, बल्कि राजनीतिक वफादारी पर टिकी है. 1957 में जब ईरान में अमेरिका-समर्थक शाह का शासन था, तब वाशिंगटन ने ही 'एटम्स फॉर पीस' कार्यक्रम के तहत ईरान को परमाणु तकनीक और ईंधन उपलब्ध कराया था. उस दौर में अमेरिका के लिए ईरान का परमाणु सपना एक 'उपहार' था, क्योंकि वह उनके भू-राजनीतिक हितों की रक्षा कर रहा था. 


लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद, जैसे ही ईरान ने एक स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और इज़रायल के वर्चस्व को चुनौती देना शुरू किया, वही परमाणु तकनीक वाशिंगटन की नजर में 'खतरा' बन गई. यह दोहरा मापदंड दर्शाता है कि अमेरिका के लिए परमाणु हथियार या तकनीक स्वयं में 'अच्छी' या 'बुरी' नहीं है, बल्कि उसे नियंत्रित करने वाली सरकार का अमेरिका और इज़रायल के प्रति रवैया ही उसकी वैधता तय करता है. 


फुकान विश्वविद्यालय और चीन विदेश मामलों के विश्वविद्यालय के विद्वानों का भी मानना है कि अमेरिका की यह 'चयनात्मक अप्रसार' नीति दरअसल एकतरफा प्रभुत्व कायम रखने का एक हथियार है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय समझौतों की अनदेखी करती है.


हालिया घटनाक्रमों ने इस कूटनीतिक पाखंड को और भी स्पष्ट कर दिया है. 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) से 2018 में अमेरिका का एकतरफा पीछे हटना और उसके बाद ईरान पर 'अधिकतम दबाव' की नीति अपनाना, इसी एकाधिकार को बनाए रखने की छटपटाहट थी. 


फरवरी 2026 में जेनेवा में हुई वार्ताओं के दौरान अमेरिका ने ईरान से उसके यूरेनियम भंडार को सौंपने और बुनियादी ढांचे को पूरी तरह नष्ट करने की जो मांगें रखीं, वे किसी संप्रभु राष्ट्र के लिए स्वीकार करना असंभव था. जब कूटनीति के माध्यम से ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर नहीं किया जा सका, तो सैन्य हमलों का सहारा लिया गया. 


28 फरवरी के हवाई हमले और उससे पहले 2025 में हुए 'बंकर बस्टर' हमले इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं ताकि ईरान की रक्षा क्षमताओं को स्थायी रूप से पंगु बनाया जा सके. यह नीति न केवल वैश्विक परमाणु अप्रसार शासन को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि एक खतरनाक मिसाल पेश कर रही है कि यदि कोई देश अमेरिकी-इजरायली हितों के खिलाफ खड़ा होता है, तो उसकी नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षमता को भी 'खतरे' के रूप में परिभाषित कर सैन्य बल से कुचल दिया जाएगा. 


अंततः, यह संघर्ष परमाणु सुरक्षा के बारे में कम और मध्य-पूर्व की सत्ता संरचना में इज़रायल की निर्विवाद सर्वोच्चता सुनिश्चित करने के बारे में अधिक है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP