US मिडटर्म: क्या खतरे में पड़ेगा ट्रंप का दबदबा या विपक्ष रचेगा इतिहास?
अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव सिर्फ संसद के नियंत्रण की जंग नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आखिरी दो सालों के भविष्य और अमेरिकी नीतियों की दिशा तय करेंगे.
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका में 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव इस समय दुनिया भर की सुर्खियों में छाए हुए हैं. इस चुनाव के दांव बहुत ऊंचे हैं, क्योंकि इनके नतीजे यह तय करेंगे कि अमेरिकी कांग्रेस (संसद) पर किस पार्टी का कब्जा होगा. इतना ही नहीं, यह जनादेश राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के आखिरी दो सालों की दिशा और दशा भी तय करेगा. इसके साथ ही कई राज्यों और स्थानीय पदों के भविष्य का फैसला भी इसी मतदान से होना है. हालांकि, वाशिंगटन की सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदलने के लिए सिर्फ चुनाव जीतना ही काफी नहीं होगा.
संसद के दोनों सदनों में वर्चस्व की कांटे की टक्कर
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक आधे सफर पर होते हैं, जिसका मतलब है कि राष्ट्रपति का पद खुद इस बैलेट पेपर पर नहीं होता. इस पूरे चुनाव का मुख्य केंद्र अमेरिकी विधायिका यानी 'कांग्रेस' पर नियंत्रण हासिल करना है. अमेरिकी कांग्रेस के दो सदन हैं: हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट.
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है, इसलिए इसकी सभी 435 सीटों पर मतदान हो रहा है. ज्यादातर सीटों पर रुझान साफ हैं, लेकिन करीब 50 सीटें ऐसी हैं जहां कांटे का मुकाबला है और यही सीटें तय करेंगी कि किस पार्टी का बहुमत होगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डेमोक्रेटिक पार्टी इस बार हाउस में बढ़त बनाकर बहुमत हासिल कर सकती है.
दूसरी तरफ, 100 सीटों वाली सीनेट में डेमोक्रेट्स के लिए राह थोड़ी कठिन है. सीनेट में सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है और इस बार केवल 35 सीटों पर चुनाव हो रहा है. इनमें से करीब एक दर्जन सीटों पर ही मुख्य मुकाबला है. हालांकि, टेक्सास और कंसास जैसे रिपब्लिकन गढ़ों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों की मजबूत पकड़ ने सीनेट की जंग को भी बेहद दिलचस्प बना दिया है.
पार्टी नियंत्रण और कानून बनाने की जटिल प्रक्रिया
संसद में बहुमत हासिल कर लेना ही कानून बनाने की गारंटी नहीं होता. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में सामान्य बहुमत से विधेयक पास हो जाते हैं, लेकिन सीनेट में किसी भी कानून को बिना रुकावट पास कराने के लिए 60 वोटों के सुपरमैजोरिटी की जरूरत होती है. इसे 'फिलीबस्टर' प्रक्रिया कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल करके अल्पसंख्यक पार्टी किसी भी बिल को अनिश्चितकाल के लिए अटका सकती है.
यदि कोई कानून दोनों सदनों से पास हो भी जाए, तब भी राष्ट्रपति के पास उसे वीटो करने का अधिकार होता है. राष्ट्रपति के वीटो को खारिज करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो अमेरिकी राजनीति में बेहद दुर्लभ माना जाता है.
क्या होगा अगर रिपब्लिकन अपनी पकड़ बनाए रखते हैं?
मौजूदा समय में रिपब्लिकन पार्टी के पास सीनेट में 53 और हाउस में 218 सीटें हैं. राष्ट्रपति पद पर ट्रंप के होने के कारण रिपब्लिकन पार्टी के पास सत्ता की पूरी ताकत है. इस बहुमत की मदद से ट्रंप ने इमिग्रेशन (ICE) की फंडिंग बढ़ाने जैसे बड़े फैसले लागू करवाए हैं. हालांकि, रिपब्लिकन अपने पूरे एजेंडे को लागू नहीं कर पाए हैं और कई मौकों पर, विशेषकर टैरिफ और ईरान युद्ध से जुड़े मुद्दों पर, पार्टी के भीतर भी मतभेद देखने को मिले हैं.
अगर रिपब्लिकन दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण बरकरार रखते हैं, तो ट्रंप के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान होगा. लेकिन 2028 के अगले राष्ट्रपति चुनाव को देखते हुए कई रिपब्लिकन सांसद अपनी छवि बचाने के लिए ट्रंप के कुछ फैसलों का विरोध भी कर सकते हैं.
डेमोक्रेट्स की जीत से बदलेंगे समीकरण
यदि डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव जीतती है, तो उनका सबसे बड़ा लक्ष्य ट्रंप के विधायी एजेंडे पर रोक लगाना होगा. विश्लेषकों का मानना है कि डेमोक्रेट्स का रुख मुख्य रूप से रक्षात्मक रहेगा, ताकि वे ट्रंप के प्रस्तावों को खारिज कर सकें.
डेमोक्रेट्स के पास अगर हाउस का नियंत्रण आता है, तो वे ट्रंप प्रशासन के खिलाफ जांच शुरू कर सकते हैं. उनके पास महाभियोग (Impeachment) चलाने का अधिकार भी होगा, हालांकि राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी, जो आसान नहीं है. इसके अलावा, यदि सीनेट पर डेमोक्रेट्स का कब्जा होता है, तो वे ट्रंप द्वारा की जाने वाली शीर्ष सरकारी और न्यायिक नियुक्तियों को रोक सकते हैं.
अर्थव्यवस्था और युद्ध पर क्या पड़ेगा असर?
डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत अमेरिकी जनता के असंतोष का संकेत तो होगी, लेकिन इससे नीतियां तुरंत नहीं बदलेंगी. अगर डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में जीत दर्ज करते हैं, तो वे महंगाई, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे मुद्दों पर दबाव बना सकते हैं. हालांकि, पेट्रोल और राशन की कीमतों में अचानक राहत देना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा.
जहां तक ईरान के साथ जारी युद्ध का सवाल है, तो अमेरिकी संविधान के तहत युद्ध की घोषणा करने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है. ट्रंप प्रशासन ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देकर बिना संसदीय मंजूरी के कार्रवाई जारी रखी है. डेमोक्रेट्स युद्ध विराम या इसकी फंडिंग रोकने के लिए विधेयक ला सकते हैं, लेकिन राष्ट्रपति के वीटो को पार करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती रहेगा.