'वंदे मातरम' राष्ट्रीय एकता का प्रतीक: मोहन भागवत
"वंदे मातरम राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है और इसे पूरा गाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए." - संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी उत्सव पर राष्ट्रगीत, सामाजिक एकता और तुष्टिकरण पर विचार साझा किए.
नागपुर । डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विजयादशमी के अवसर पर आयोजित वार्षिक रैली को संबोधित करते हुए कहा कि 'वंदे मातरम' भारत की राष्ट्रीय अखंडता और एकता का एक अनूठा प्रतीक है. उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस राष्ट्रगीत को पूरी निडरता, गर्व और बुलंद आवाज में पूरा गाने में किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट या आपत्ति नहीं होनी चाहिए.
अपने संबोधन में इतिहास का उल्लेख करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने की साजिश रची थी, तब भारतीय समाज ने एकजुट होकर अंग्रेजों के इस फैसले का कड़ा विरोध किया था. उसी ऐतिहासिक संघर्ष के दौर में 'वंदे मातरम' देशभक्ति और एकजुटता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में उभरा, जिसके सामने ब्रिटिश हुकूमत को बंगाल विभाजन का फैसला वापस लेना पड़ा था.
मोहन भागवत ने सवाल उठाया कि जो एकता बंगाल विभाजन को रद्द करा सकती थी, वह 1947 के विभाजन को क्यों नहीं रोक सकी?
इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि विभाजन चाहने वाली ताकतों ने समाज के मन में यह भावना भर दी कि अलग दिखने के कारण वे एक-दूसरे से भिन्न और अलग हैं. इसके साथ ही उन्होंने तुष्टिकरण की मानसिकता पर निशाना साधते हुए कहा कि इसी सोच ने अलगाववादी तत्वों के हौसले बुलंद किए और अंततः देश को विभाजन के दर्दनाक मोड़ पर ला खड़ा किया.
विभाजन के परिणामों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जिस अलग अस्तित्व के नाम पर शांति और समृद्धि के सपने दिखाए गए थे, वे कभी सच नहीं हुए. इसके विपरीत देश को सीमाओं पर तनाव, आंतरिक अविश्वास, असुरक्षा और बात-बात पर होने वाले आपसी संघर्ष का सामना करना पड़ा है.
संघ प्रमुख ने भारतीय मूल्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत माता के प्रति निष्ठा, पूर्वजों पर गर्व और सनातन भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिक मानवीय मूल्य ही देश को हमेशा एकजुट रखते आए हैं.
इस संदर्भ में उन्होंने फ्लाईदुबई विमान के भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिन्होंने मिड-एयर हमले के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर 174 यात्रियों और चालक दल के सदस्यों की सुरक्षा की थी. भागवत ने कहा कि यही भारतीय संस्कार और मूल्य हैं जो व्यक्ति को दूसरों के प्राण बचाने के लिए खुद को संकट में डालने की प्रेरणा देते हैं.
अंत में, आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ हिंदू समाज को संगठित, सशक्त और जागरूक बनाने का कार्य कर रहा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू समाज का दृष्टिकोण समावेशी है और ऐसे प्रयासों से समाज में भावनात्मक एकता, सद्भाव और श्रेष्ठ आचरण को और अधिक मजबूती मिलेगी.