अवैध हुए ट्रंप के वैश्विक टैरिफ, $175 अरब की वापसी पर छिड़ी कानूनी जंग
वाशिंगटन । डेस्क: अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए व्यापक वैश्विक टैरिफ के खिलाफ एक बड़ा फैसला सुनाया है, जिससे अब $175 अरब के रिफंड को लेकर एक बड़ी कानूनी और प्रक्रियात्मक उलझन खड़ी हो गई है. मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स की अध्यक्षता में 6–3 के बहुमत से आए इस फैसले में कहा गया है कि राष्ट्रपति ने 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' (IEEPA) का उपयोग करते हुए अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है.
हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि पिछले कई महीनों में वसूला गया यह भारी-भरकम फंड व्यापारिक भागीदारों और आयातकों को वापस कैसे किया जाएगा. जस्टिस ब्रेट कवानुघ ने अपनी असहमति में चेतावनी दी है कि रिफंड की यह पूरी प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से एक बड़ी मुसीबत साबित होगी. अब यह मामला अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय के पास वापस जाएगा, जो रिफंड की निगरानी करेगा.
वर्तमान में 1,000 से अधिक आयातकों ने पहले ही रिफंड के लिए मुकदमे दर्ज कर रखे हैं और अब नए मामलों की बाढ़ आने की उम्मीद है. कानूनी विशेषज्ञों, जैसे जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ग्रेग शैफर का कहना है कि प्रशासन संभवतः स्वेच्छा से यह पैसा वापस नहीं करेगा.
इसके बजाय, सरकार हर कंपनी से व्यक्तिगत रूप से आवेदन और औपचारिक विरोध दर्ज कराने को कह सकती है, जिससे यह प्रक्रिया लंबी और खर्चीली हो जाएगी. यह स्थिति विशेष रूप से छोटे व्यापारियों के लिए नुकसानदेह हो सकती है, क्योंकि उनके लिए वकीलों का खर्च और कागजी कार्यवाही का समय उनके रिफंड की राशि से भी भारी पड़ सकता है. बड़े निगम तो अपना पैसा वापस पाने में सफल हो सकते हैं, लेकिन छोटे आयातकों के लिए यह एक कठिन चुनौती होगी.
इस अदालती झटके के बावजूद, ट्रंप प्रशासन पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की है कि वह रद्द किए गए आपातकालीन कर्तव्यों की जगह 150 दिनों के लिए 10 प्रतिशत का नया वैश्विक टैरिफ लगाएंगे. इस बार वह 'ट्रेड एक्ट 1974' की धारा 122 का सहारा लेंगे, जो राष्ट्रपति को भुगतान संतुलन की समस्याओं के आधार पर 15 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की अनुमति देता है.
इसके अलावा, प्रशासन के पास स्टील, एल्युमीनियम और कारों जैसे विशिष्ट क्षेत्रों पर टैरिफ बनाए रखने के लिए अन्य कानूनी रास्ते भी मौजूद हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के खिलाफ 'धारा 301' के तहत जांच और पुराने 'स्मूट-हॉली एक्ट' की धारा 338 का उपयोग करके भी भविष्य में व्यापारिक प्रतिद्वंद्वियों पर दबाव बनाया जा सकता है, हालांकि ये नए टैक्स पिछले आयात पर लागू नहीं होंगे.
राजनीतिक रूप से इस फैसले ने अमेरिकी कांग्रेस पर भी दबाव बढ़ा दिया है. मुख्य न्यायाधीश रॉबर्ट्स ने स्पष्ट किया है कि टैरिफ लगाने के लिए राष्ट्रपति को कांग्रेस से स्पष्ट अनुमति लेनी चाहिए. जहां डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने इस फैसले को परिवारों और छोटे व्यवसायों के लिए राहत बताया है, वहीं हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने कहा है कि कांग्रेस और प्रशासन मिलकर आगे का रास्ता तय करेंगे.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकार ने टैरिफ से मिला पैसा पहले ही खर्च कर दिया है, तो रिफंड के लिए बजट कहाँ से आएगा. अमेरिकन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बाबक हाफेजी के अनुसार, कांग्रेस को इसके लिए नया कानून बनाना पड़ सकता है और यह तय करना होगा कि रिफंड का हकदार सिर्फ आयातक है या वह आम ग्राहक भी जिसने महंगा सामान खरीदा. कुल मिलाकर, यह कानूनी लड़ाई सालों तक खिंच सकती है.