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सुप्रीम कोर्ट ने CGMSC पर लगाया 1 लाख का जुर्माना हटाया

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15 अग. 2026, 06:16 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन लिमिटेड (सीजीएमएससी) को बड़ी राहत देते हुए उस पर लगाए गए एक लाख रुपये के जुर्माने के आदेश को रद्द कर दिया है. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने ठेकेदार की वित्तीय बोली को अनुचित तरीके से खारिज करने के मामले में निगम पर यह लागत लगाई थी. जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने निगम द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया. 


शीर्ष अदालत ने अपने अवलोकन में पाया कि निगम ने टेंडर नियमों के अनुसार ठेकेदार द्वारा दिए गए सटीक ईमेल पते पर ही स्पष्टीकरण के नोटिस भेजे थे. निगम की ओर से किसी भी तरह की प्रक्रियात्मक त्रुटि न पाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने उस पर लगाए गए जुर्माने को हटाते हुए याचिका का पूरी तरह से निपटारा कर दिया.


यह पूरा मामला जशपुर जिले में 50 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण के लिए जारी एक निविदा प्रक्रिया से शुरू हुआ था. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2026 को दिए अपने आदेश में निगम को निर्देश दिया था कि वह एक नागरिक ठेकेदार को एक लाख रुपये का मुआवजा दे. 


उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने पाया था कि ठेकेदार को वित्तीय बोली से मनमाने और अनुचित तरीके से बाहर कर दिया गया था. 23 सितंबर 2025 को जारी इस टेंडर में पत्थलगांव के कोटबा स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को 50 बिस्तरों वाले अस्पताल में बदलने का निर्माण कार्य शामिल था, जिसकी अनुमानित लागत 400.98 लाख रुपये थी.


ठेकेदार की बोली अनुमानित लागत से 9.9 प्रतिशत कम थी, जबकि जिस फर्म को काम सौंपा गया उसकी बोली 9.22 प्रतिशत कम थी. इसके बावजूद तकनीकी बोली खारिज होने के कारण सबसे कम बोली लगाने वाले ठेकेदार की वित्तीय बोली खोली ही नहीं गई. 


ठेकेदार का आरोप था कि निगम ने जिस ईमेल पते पर दस्तावेज से संबंधित स्पष्टीकरण मांगा था, वह उसने टेंडर के लिए कभी दिया ही नहीं था. उच्च न्यायालय ने माना था कि यह एक गंभीर विफलता है और सार्वजनिक प्राधिकरण से निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है. 


इसके अलावा, अदालत ने यह भी देखा था कि ठेकेदार द्वारा प्रस्तुत उन्हीं दस्तावेजों को निगम ने एक अन्य निविदा में स्वीकार कर लिया था, लेकिन इस निविदा में बिना किसी उचित कारण के खारिज कर दिया. अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना था.


हालांकि, चूंकि निर्माण कार्य पहले ही आवंटित हो चुका था और प्रगति पर था, इसलिए उच्च न्यायालय ने जनहित में परियोजना को बाधित न करने के उद्देश्य से अनुबंध को रद्द नहीं किया था. इसके बजाय, अदालत ने राहत के रूप में निगम को चार सप्ताह के भीतर ठेकेदार को 1 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रियात्मक अनियमितता के दावे को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा लगाए गए इस जुर्माने को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP