सुप्रीम कोर्ट की छत्तीसगढ़ पुलिस पर सख्त टिप्पणी, DGP को बताया “पूरी तरह अक्षम”
नई दिल्ली । डेस्क: देश में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों और प्रशासन की शिथिलता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाया है. छत्तीसगढ़ में हुए एक चर्चित कस्टोडियल डेथ मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने एफआईआर दर्ज करने में हुई अत्यधिक देरी पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) के रवैये को "पूरी तरह अक्षम" करार दिया.
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ मृतक की पत्नी और उनकी दो बेटियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुलिस हिरासत में दी गई यातना के कारण मृतक की जान गई है. जनवरी 2024 में हुई इस घटना के बाद से ही पीड़ित परिवार न्याय के लिए संघर्ष कर रहा है. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के गृह सचिव और डीजीपी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया था.
मामले के विवरण के अनुसार, 34 वर्षीय व्यक्ति को 18 जनवरी 2024 को उसकी किराने की दुकान के बाहर बिक्री के लिए शराब रखने के आरोप में हिरासत में लिया गया था. गिरफ्तारी के तीन दिन बाद, 21 जनवरी को उसे गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां अगली सुबह करीब 6 बजे उसकी मृत्यु हो गई. इस घटना के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176 के तहत न्यायिक जांच शुरू की गई. जुलाई 2024 में सौंपी गई न्यायिक जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला गया था कि व्यक्ति की मृत्यु किसी कुंद हथियार से सिर पर लगी गंभीर चोट के कारण हुई है.
न्यायिक जांच में सिर पर चोट लगने से मौत की पुष्टि होने के बावजूद, छत्तीसगढ़ पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज करने में ढाई साल से भी अधिक का समय लगा दिया. एफआईआर आखिरकार 30 जुलाई 2026 को दर्ज की गई. सुनवाई के दौरान जब डीजीपी ने देरी का कारण बताते हुए कहा कि पुलिस विभाग को न्यायिक जांच रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई थी, तो पीठ ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया. न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने याद दिलाया कि यह रिपोर्ट तो हाई कोर्ट में राज्य द्वारा दाखिल हलफनामे के साथ पहले से ही संलग्न थी. अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार विभिन्न पहलुओं पर न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास कर रही है और इस आचरण के लिए अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है.
जब डीजीपी ने यह तर्क देने की कोशिश की कि न्यायिक रिपोर्ट से कोई संज्ञेय अपराध प्रकट नहीं होता, तो पीठ ने तीखी प्रतिक्रिया दी. अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि सिर पर कुंद हथियार से वार कर हत्या कर देना संज्ञेय अपराध नहीं है, तो फिर क्या है? अदालत ने टिप्पणी की कि जिस तरह से इस मामले को संभाला गया है, उससे यह प्रतीत नहीं होता कि छत्तीसगढ़ का पुलिस प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष जांच करने में सक्षम है.
इससे पहले, पीड़ित परिवार ने निष्पक्ष जांच और 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग को लेकर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. हालांकि, हाई कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए महज 1 लाख रुपये का मुआवजा दिया था और न तो एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए थे और न ही यातना के आरोपों की जांच के.
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा दिए गए मुआवजे को "पूर्णतः अपर्याप्त" और परिवार को हुए नुकसान की तुलना में अनुचित बताया. शीर्ष अदालत ने संकेत दिया है कि मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जांच को किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को सौंपा जा सकता है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है. (Imput- The Law Advice)