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SC: छत्तीसगढ़ में पादरियों पर रोक वाले होर्डिंग्स के खिलाफ याचिका खारिज

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16 फ़र. 2026, 02:18 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के कुछ ग्राम सभाओं द्वारा ईसाई पादरियों के प्रवेश पर रोक लगाने वाले होर्डिंग्स को चुनौती देने वाली याचिका सोमवार को खारिज कर दी है. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्ताओं को राज्य के 'पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियम' यानी पेसा (PESA) नियमों के तहत वैधानिक प्राधिकरण के पास जाने का निर्देश दिया गया था. 


शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को उच्च न्यायालय के 28 अक्टूबर, 2025 के निर्णय के अनुसार उचित मंच पर अपनी बात रखनी चाहिए थी, क्योंकि उच्च न्यायालय ने उन्हें सक्षम प्राधिकारी के पास जाने की स्वतंत्रता पहले ही प्रदान कर दी थी.


इस मामले की जड़ें छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में लगी उन होर्डिंग्स में हैं, जिनमें कथित तौर पर "जबरन धर्मांतरण" के डर से पादरियों और मिशनरियों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की बात कही गई थी. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि ये होर्डिंग्स ईसाई समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए पेसा अधिनियम का दुरुपयोग हैं. 


हालांकि, सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 1977 के प्रसिद्ध 'स्टेनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले का हवाला देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत "धर्म के प्रचार के अधिकार" में किसी व्यक्ति को लालच, बल या धोखाधड़ी से धर्मांतरित करने का अधिकार शामिल नहीं है. 


वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने दलील दी कि बिना किसी ठोस सामग्री के धर्मांतरण को लेकर ऐसी टिप्पणियां की गई हैं, लेकिन अदालत ने प्रक्रियात्मक आधार पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.


छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अपने विस्तृत फैसले में धर्मांतरण को भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य के लिए एक संवेदनशील मुद्दा करार दिया था. उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि मिशनरी समूहों द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर और अशिक्षित आदिवासियों को शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय सहायता का लालच देकर धर्मांतरण करना एक "सामाजिक अभिशाप" है, जो स्वदेशी समुदायों की सांस्कृतिक निरंतरता और एकता को खतरे में डालता है. 


कोर्ट ने यह भी कहा कि जब धर्मांतरण व्यक्तिगत विश्वास के बजाय प्रलोभन या हेरफेर का परिणाम बन जाता है, तो यह स्वैच्छिक आस्था की भावना को विकृत करता है. उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि आदिवासियों का अपनी पारंपरिक मान्यताओं से कटना गांवों में ध्रुवीकरण और सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थिति पैदा करता है, जिससे अंततः सामाजिक सद्भाव बिगड़ता है.


छत्तीसगढ़ सरकार ने किया स्वागत


छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री गृहमंत्री विजय शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा ग्राम सभाओं के पक्ष में दिए गए निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय संविधान की भावना, आदिवासी संस्कृति एवं परंपराओं की संरक्षण तथा पेसा कानून के प्रावधानों की पुनः पुष्टि करता है. छत्तीसगढ़ सरकार ग्राम सभाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.


उन्होंने कहा कि हमारी सरकार ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से इस प्रकरण में सशक्त पक्ष रखा और न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि परंपराओं एवं सामाजिक संरचना के संरक्षण हेतु ग्राम सभाएं वैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर सकती हैं. यह निर्णय आदिवासी स्वशासन की अवधारणा को सुदृढ़ करने वाला है.


विजय शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार ग्राम सभाओं के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण और जनजातीय अस्मिता की रक्षा हेतु निरंतर कार्य करती रहेगी.


गृहमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र हेतु पेसा नियमों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए कार्य भी कर रही है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP