पिता का टैक्स बकाया होने पर बेटे का बस परमिट नहीं रोक सकते- HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बस परमिट से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि यदि मोटर वाहन अधिनियम में कोई स्पष्ट वैधानिक प्रतिबंध नहीं है, तो परिवार के किसी सदस्य पर टैक्स बकाया होने के आधार पर किसी अन्य व्यक्ति को वाणिज्यिक वाहन परमिट देने से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने साफ किया कि जब तक कानून का स्पष्ट समर्थन न हो, एक पारिवारिक सदस्य की चूक या देनदारी के लिए दूसरे सदस्य को दंडित नहीं किया जा सकता.
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने एक बस ऑपरेटर की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया. याचिकाकर्ता ने राज्य परिवहन प्राधिकरण (STA) और राज्य परिवहन अपील ट्रिब्यूनल (STAT) के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिसके तहत अंबिकापुर से बोकारो (झारखंड) मार्ग के लिए उसके अंतर-राज्यीय स्थायी स्टेज कैरिज परमिट आवेदन को खारिज कर दिया गया था.
प्राधिकरणों ने निरस्तीकरण का मुख्य आधार याचिकाकर्ता के पिता पर बकाया परिवहन कर को बनाया था.
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता एक स्वतंत्र बस ऑपरेटर है और उसने अपने व्यक्तिगत नाम से आवेदन किया है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत उसे अपना व्यवसाय चलाने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, जिसे केवल कानून द्वारा बनाए गए उचित प्रतिबंधों (अनुच्छेद 19(6)) के तहत ही सीमित किया जा सकता है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो आवेदक को उसके परिजनों के टैक्स बकाए के कारण अयोग्य ठहराता हो.
उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल और प्राधिकरण के तर्कों को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि परिजनों की देनदारी को आवेदक पर थोपना संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन है. इसी के साथ अदालत ने एसटीए और एसटीएटी के पूर्व आदेशों को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया.