छत्तीसगढ़ में वेतन के मामले में कैजुअल लेबर की स्थिति अत्यंत दयनीय- SBI
नई दिल्ली । डेस्क: भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की नवीनतम शोध रिपोर्ट में देश के श्रम बाजार को लेकर एक चिंताजनक खुलासा हुआ है. पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) 2025 के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लगभग 25 प्रतिशत आकस्मिक श्रमिक (Casual Workers) आज भी कानूनी रूप से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम वेतन प्राप्त कर रहे हैं.
रिपोर्ट बताती है कि न्यूनतम वेतन नियमों के पालन के मामले में राज्यों के बीच भारी असमानता है, जहाँ छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में स्थिति अत्यंत दयनीय है. छत्तीसगढ़ में लगभग 70 प्रतिशत आकस्मिक श्रमिकों को न्यूनतम वेतन नहीं मिल रहा है, जबकि ओडिशा में यह आंकड़ा 66 प्रतिशत और झारखंड में 65 प्रतिशत है.
इसके विपरीत, दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे तेलंगाना और तमिलनाडु में अनुपालन काफी बेहतर पाया गया है, जबकि आंध्र प्रदेश में न्यूनतम वेतन उल्लंघन का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है.
रिपोर्ट में वेतन के मामले में लैंगिक भेदभाव की भी एक डरावनी तस्वीर पेश की गई है. आंकड़ों के अनुसार, कुल आकस्मिक कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 25 प्रतिशत है, लेकिन कम वेतन पाने वाले कुल श्रमिकों में उनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत तक पहुँच जाती है.
इसके मुकाबले पुरुष श्रमिक कुल कार्यबल का 75 प्रतिशत होने के बावजूद अंडरपेमेंट के 55 प्रतिशत मामलों में शामिल हैं, जो दर्शाता है कि आकस्मिक क्षेत्र में महिलाओं का आर्थिक शोषण अधिक हो रहा है.
पंजाब, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख आर्थिक केंद्रों में भी लगभग एक-तिहाई श्रमिक इस शोषण का शिकार हैं. एसबीआई की इस रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्यों को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम को सख्ती से लागू करने की तत्काल आवश्यकता है.