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पुणे के वैज्ञानिकों ने खोजा LPG का विकल्प, डाइमिथाइल ईथर

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04 अप्रै. 2026, 09:49 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

DME Gas
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नई दिल्ली । डेस्क: बढ़ती महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है. युद्ध और अन्य भू-राजनीतिक कारणों से एलपीजी की आपूर्ति में आने वाली बाधाओं ने एक बड़े संकट को जन्म दिया है. ऐसे समय में, भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो न केवल एलपीजी पर हमारी निर्भरता कम कर सकती है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी वरदान साबित होगी. 


पुणे स्थित सीएसआईआर-राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (एनसीएल) के वैज्ञानिकों ने साल 2016 से चल रहे अपने शोध के आधार पर 'डाइमिथाइल ईथर' (डीएमई) को भविष्य के ईंधन के रूप में पेश किया है.


वैज्ञानिक राजा थिरुमलाईस्वामी और उनकी टीम के अनुसार, डाइमिथाइल ईथर एक रंगहीन और पर्यावरण के अनुकूल जैविक यौगिक है जिसे मेथनॉल से तैयार किया जाता है. 


इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे एलपीजी की तरह ही आसानी से तरल रूप में बदला जा सकता है, जिससे इसे मौजूदा सिलेंडरों और पाइपलाइनों के माध्यम से घरों तक पहुँचाना संभव होगा. 


विशेषज्ञों का दावा है कि यह एक 'क्लीन बर्निंग फ्यूल' है, क्योंकि जलते समय यह सल्फर डाइऑक्साइड या नाइट्रिक ऑक्साइड जैसे हानिकारक रसायनों का उत्सर्जन नहीं करता. यह ओजोन परत को नुकसान नहीं पहुँचाता और अन्य गैसों की तरह क्लोरोफ्लोरोकार्बन भी पैदा नहीं करता है.


डीएमई का उत्पादन भारत के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय, दोनों मोर्चों पर फायदेमंद है. इसे कोयले, कृषि अपशिष्ट, सड़े हुए पत्तों, गोबर और यहाँ तक कि प्लास्टिक कचरे से भी बनाया जा सकता है. 


यह तकनीक न केवल कचरा प्रबंधन में मदद करेगी, बल्कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को 'हाइड्रोजनेशन' प्रक्रिया के जरिए दोबारा ईंधन में बदलने में भी सक्षम है. 


वर्तमान में वैज्ञानिकों की योजना एलपीजी में 20 से 25 प्रतिशत तक डाइमिथाइल ईथर मिलाकर उपयोग करने की है. पुणे में प्रतिदिन लगभग 2500 किलोग्राम डीएमई का उत्पादन शुरू हो चुका है और शोधकर्ता इसकी क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहे हैं. 


इस तकनीक की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिनलैंड और घाना जैसे देशों ने भी भारत से इस तकनीक की मांग की है.


अगर बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन शुरू होता है, तो भारत को एलपीजी के भारी-भरकम आयात से मुक्ति मिल सकती है. 


वैज्ञानिकों का मानना है कि यह न केवल रसोई गैस का विकल्प बनेगा, बल्कि आने वाले समय में इसे डीजल की जगह औद्योगिक मशीनों और वाहनों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा. 


प्राकृतिक गैस के सीमित भंडारों के बीच, डाइमिथाइल ईथर ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है. यदि सरकार और उद्योग जगत इस शोध को बड़े स्तर पर अपनाते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत के हर घर में सस्ता और स्वदेशी 'ग्रीन फ्यूल' जलता नजर आएगा.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP