सात फेरे न होने की दलील खारिज, HC बोला- रस्मों के विवाद से शादी अमान्य नहीं
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने विवाह से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल रस्मों या सप्तपदी (सात फेरे) न होने के विवाद के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी को शून्य घोषित नहीं किया जा सकता.
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने विवाह से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल रस्मों या सप्तपदी (सात फेरे) न होने के विवाद के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी को शून्य घोषित नहीं किया जा सकता. न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने पति की याचिका खारिज करते हुए परिवार अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि विवाह को अमान्य ठहराने के कानूनी आधार बेहद सीमित हैं.
अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धाराओं का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए कहा कि धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के लिए धारा 5 की अनिवार्य शर्तों का उल्लंघन होना आवश्यक है. केवल परंपराओं या रस्मों से जुड़े विवादों के आधार पर किसी शादी को शून्य नहीं माना जा सकता.
उच्च न्यायालय ने पाया कि परिवार अदालत ने कानूनी शर्तों का सही विश्लेषण किए बिना रस्मों के विवाद पर फैसला सुनाया था, जो कि एक कानूनी त्रुटि थी.
यह पूरा विवाद जांजगीर-चांपा जिले के राहौद क्षेत्र के एक जोड़े से जुड़ा है. सोशल मीडिया पर पहचान के बाद दोनों के बीच प्रेम संबंध बने और 3 फरवरी, 2022 को चिरमिरी के एक शिव मंदिर में उन्होंने विवाह रचाया, जिसके दस्तावेज भी तैयार किए गए थे. शादी के बाद दोनों लगभग डेढ़ महीने तक साथ रहे, लेकिन बाद में विवाद शुरू हो गया.
पति ने आरोप लगाया था कि युवती के परिजनों ने आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देकर जबरन विवाह के कागजातों पर हस्ताक्षर कराए थे. उसने तर्क दिया कि विवाह में अग्नि के सामने सात फेरे नहीं लिए गए थे, इसलिए धारा 11 के तहत इसे अमान्य घोषित किया जाए.
वहीं, पत्नी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अदालत में कहा कि विवाह सभी रीति-रिवाजों के साथ हुआ था और पति केवल भरण-पोषण (मासिक भत्ता) की जिम्मेदारी से बचने के लिए इसे शून्य घोषित कराना चाहता है. हाईकोर्ट ने कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए पति की अर्जी पूरी तरह से खारिज कर दी.