बीजापुर में 21 साल बाद फिर गूंजी स्कूलों की घंटियां
बीजापुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले के सुदूर और बीहड़ इलाकों में भय के माहौल को मात देकर एक बार फिर शिक्षा की अलख जग उठी है. राज्य सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता और बीजापुर के जिला कलेक्टर विश्वदीप के नेतृत्व में चलाए गए एक विशेष अभियान के तहत नए शैक्षणिक सत्र में 37 लंबे समय से बंद पड़े स्कूलों को दोबारा शुरू किया गया है.
इस ऐतिहासिक पहल के जरिए करीब 21 सालों से जारी शैक्षिक अंधकार को समाप्त कर 1,000 से अधिक बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा गया है.
बीजापुर, भैरमगढ़, उसूर और भोपालपटनम जैसे दूरस्थ ब्लॉकों में, जहां कभी वरिष्ठ नक्सली नेताओं का गढ़ माना जाता था, अब सुरक्षा बलों की मंजूरी और इलाकों के माओवादी-मुक्त घोषित होने के बाद एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है.
जिला प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग ने 'शिक्षा का अधिकार' कानून के तहत यह सुनिश्चित करने के लिए समन्वित अभियान चलाया है कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे.
इस बदलाव की नींव 2005 के दौर में छिपी है, जब सलवा जुडूम आंदोलन के समय नक्सलियों ने सरकारी तंत्र की उपस्थिति को मिटाने के लिए 300 से अधिक स्कूल भवनों को विस्फोट से उड़ा दिया था. पीड़िया, गमपुर, मड़मेटा, ताकीलोद और दरभा जैसे गांवों में दो दशकों से स्कूल पूरी तरह गायब हो चुके थे.
शिक्षा के इस पुनर्निर्माण को गति देने के लिए ग्राम पंचायतों के प्रस्तावों के माध्यम से स्थानीय शिक्षित युवाओं को 'शिक्षादूत' के रूप में नियुक्त किया गया है, जिनका वित्तपोषण जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) निधि से किया जा रहा है.
स्थायी इमारतों के निर्माण का काम जारी रहने के बीच, स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन के सहयोग से झोपड़ियां बनाकर तत्काल कक्षाएं शुरू की हैं, जहां बच्चों को पाठ्यपुस्तकें, यूनिफॉर्म और सीखने की किट प्रदान की गई हैं. यह प्रयास सिर्फ अक्षर ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भय के माहौल में शांति स्थापित कर मानवीय गरिमा को बहाल करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है.