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SC ने छत्तीसगढ़ पर 2 लाख रुपये का कॉस्ट लगाया

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20 जून 2026, 02:51 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को एक बड़ा झटका देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें लोक निर्माण विभाग द्वारा बिना किसी औपचारिक अधिग्रहण के करीब 25 वर्षों तक कब्जाए रखी गई जमीनों के मुआवजे और ब्याज में बढ़ोतरी को चुनौती दी गई थी. अदालत ने राज्य सरकार की इस अपील को 'पूरी तरह से तुच्छ' करार दिया और उस पर 2 लाख रुपये का जुर्माना (कॉस्ट) भी लगाया.  


यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का है, जहां साल 1986 में पीडब्ल्यूडी ने सड़क निर्माण के लिए कुछ भूस्वामियों की जमीन पर बिना कानूनी प्रक्रिया के कब्जा कर लिया था. इस अवैध कब्जे का खुलासा 3 मई 2006 को सीमांकन की कार्रवाई के दौरान हुआ. 


इसके बाद प्रभावित भूस्वामियों ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के तहत विभाग को बेदखल करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया. बाद में राज्य सरकार ने साल 2010 में भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 के तहत अधिसूचना जारी कर अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की और जून 2011 में एक अंतिम अवार्ड पारित कर वित्तीय वर्ष 2009-10 की गाइडलाइन के आधार पर 4,308 रुपये प्रति वर्ग मीटर का मुआवजा तय किया.


हालांकि, जब यह मामला भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 18 के तहत रेफरेंस कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने वित्तीय वर्ष 2010-11 की संशोधित गाइडलाइन दरों को लागू करते हुए मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 5,380 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दिया. 


इसके साथ ही रेफरेंस कोर्ट ने अधिसूचना प्रकाशन की तारीख से पहले वर्ष के लिए 9 प्रतिशत वार्षिक और उसके बाद भुगतान होने तक 15 प्रतिशत की दर से ब्याज देने का भी आदेश दिया. 

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भी इस बढ़े हुए बाजार मूल्य को बरकरार रखा और फैसला सुनाया कि भूस्वामी उस तारीख (2 सितंबर 2006) से ब्याज पाने के हकदार हैं जब उन्होंने बेदखली का मुकदमा दायर किया था.


सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने हाई कोर्ट के इस फैसले को पूरी तरह सही ठहराया. शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि बेदखली का मुकदमा दायर होने की तारीख से ब्याज की गणना नहीं की जानी चाहिए. 


सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि राज्य ने लंबे समय तक अनधिकृत रूप से जमीन का उपयोग किया और मुकदमा दायर होने के बाद भी मुआवजे की कोई पेशकश नहीं की, इसलिए हाई कोर्ट द्वारा ब्याज का आदेश देना पूरी तरह न्यायसंगत था. अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले को दोबारा खींचना भूस्वामियों को परेशान करने और उन्हें उनके अधिकार से वंचित करने का प्रयास है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP