रायपुर: 'फर्जी' PIL लगाने वाले पर HC ने ठोका ₹50,000 जुर्माना
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राजधानी रायपुर के रायपुर स्थित लेमेहाई तालाब (वार्ड नंबर 79) में गंदा पानी छोड़े जाने को रोकने के लिए दायर एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है. हाईकोर्ट ने इसे "दुर्भावनापूर्ण और निजी स्वार्थ से प्रेरित" करार देते हुए याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये का भारी जुर्माना भी लगाया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि अदालत का कीमती समय बर्बाद करने और निजी विवादों को जनहित का मुखौटा पहनाने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती.
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता अजय कुमार निषाद ने कोर्ट से यह जानकारी छिपाई थी कि उसी तालाब में मछली पालन के ठेके को लेकर उसका नगर निगम के साथ विवाद चल रहा था.
अजय कुमार निषाद द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि रिहायशी कॉलोनियों का अनुपचारित सीवेज सीधे तालाब में गिर रहा है, जिससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, बल्कि धार्मिक और सामुदायिक कार्यों के लिए उपयोग होने वाला यह जल स्रोत प्रदूषित हो रहा है.
याचिकाकर्ता के वकील अखिलेश मिश्रा ने तर्क दिया था कि नगर निगम रायपुर और पर्यावरण संरक्षण मंडल अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहे हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.
हालांकि, नगर निगम की ओर से पेश वकील पंकज अग्रवाल ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने इस तालाब के मछली पालन अधिकारों के लिए निविदा (टेंडर) प्रक्रिया में भाग लिया था और वह सबसे कम बोली लगाने वाला (L-1) चुना गया था, लेकिन बार-बार सूचना देने के बाद भी उसने लीज की राशि जमा नहीं की.
निगम ने तर्क दिया कि जब उसे ठेका नहीं मिला, तो उसने निजी रंजिश निकालने के लिए जनहित याचिका का सहारा लिया.
हाईकोर्ट ने दस्तावेजों के अवलोकन के बाद पाया कि याचिकाकर्ता ने अपने व्यावसायिक हितों को जानबूझकर छिपाया था. पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि जनहित याचिका दायर करने वाले व्यक्ति का "हाथ साफ, दिल साफ और उद्देश्य साफ" होना चाहिए.
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न पुराने फैसलों का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि यह याचिका वास्तव में सार्वजनिक हित के लिए नहीं, बल्कि एक असफल व्यावसायिक निविदा के कारण पैदा हुई कुंठा का परिणाम थी. कोर्ट ने माना कि "साफ हाथों" के साथ अदालत न आना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है.
अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए अजय कुमार निषाद को निर्देश दिया है कि वह एक महीने के भीतर 50,000 रुपये की जुर्माना राशि हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करें. यह राशि रायपुर के माना कैंप स्थित मानसिक रूप से अविकसित बच्चों के सरकारी गृह को हस्तांतरित की जाएगी.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता समय पर यह राशि जमा नहीं करता है, तो इसे भू-राजस्व की बकाया राशि के रूप में वसूला जाएगा.
इसके साथ ही, याचिका दाखिल करते समय जमा की गई 15,000 रुपये की सुरक्षा राशि को भी जब्त करने का आदेश दिया गया है. यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है जो निजी हितों को साधने के लिए जनहित याचिकाओं का गलत इस्तेमाल करते हैं.