रेप पीड़िता पर पंचायत का जुल्म: FIR कराई तो 12 साल का बहिष्कार
अंबिकापुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकासखंड में एक आदिवासी दुष्कर्म पीड़िता और उसके परिवार को न्याय मांगना भारी पड़ गया. गाँव की पंचायत ने सात महीने की गर्भवती पीड़िता, उसके परिवार और उसकी मदद करने वाले रिश्तेदारों का 12 साल के लिए सामाजिक बहिष्कार करने का फरमान सुनाया है. मामला वाड्रफनगर के बसंतपुर थाना क्षेत्र का है.
पीड़िता का आरोप है कि उसके एक दोस्त ने शादी का झांसा देकर उसके साथ दुष्कर्म किया. जब वह गर्भवती हुई और उसने शादी का दबाव बनाया, तो युवक मुकर गया.
इसके बाद महिला ने पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई, जिसके आधार पर आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.
पुलिसिया कार्रवाई से नाराज होकर गाँव के सरपंच और पंचायत ने बैठक बुलाई और पीड़िता के परिवार को समाज से बेदखल कर दिया. पंचायत का दावा है कि युवक को झूठे मामले में फंसाया गया है.
बहिष्कार के साथ ही पंचायत ने वापसी के लिए बेहद अपमानजनक शर्तें रखी हैं. परिवार का आरोप है कि उन्हें समाज में वापस आने के लिए पूरे गाँव के पैर धोकर उस पानी से नहाने को कहा गया है. इसके अलावा, दंड के रूप में पूरे समुदाय को बकरी का मांस, चावल और शराब परोसने का आदेश दिया गया है.
फिलहाल, पीड़ित परिवार ने जिला प्रशासन से सुरक्षा और न्याय की गुहार लगाई है, जिसके बाद अधिकारियों ने मामले की जांच और कानूनी कार्रवाई का भरोसा दिया है.
गौरतलब है कि इस मामले में भारतीय कानून और मानवाधिकार सिद्धांत स्पष्ट रूप से पीड़िता और उसके परिवार के पक्ष में खड़े हैं. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है, जिसका उल्लंघन पंचायत द्वारा दी गई अपमानजनक शर्तें और सामाजिक बहिष्कार सीधे तौर पर करते हैं.
किसी भी व्यक्ति या पंचायत के पास यह कानूनी अधिकार नहीं है कि वह किसी परिवार को बुनियादी सामाजिक संपर्क, धार्मिक आयोजनों या सामुदायिक संसाधनों से वंचित करे. सर्वोच्च न्यायालय ने 'खाप पंचायतों' और इसी तरह की अनौपचारिक सभाओं के ऐसे तुगलकी फरमानों को पूरी तरह से असंवैधानिक और अवैध घोषित किया है.
पीड़िता के पास भारतीय न्याय संहिता के तहत मानहानि, आपराधिक धमकी और जबरन वसूली की धाराओं में शिकायत दर्ज करने का अधिकार है.
साथ ही, चूंकि यह मामला एक आदिवासी परिवार से जुड़ा है, इसलिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की सख्त धाराएं उन लोगों पर लागू होती हैं जिन्होंने परिवार का बहिष्कार किया है या उन्हें अपमानजनक कार्य करने के लिए मजबूर किया है.
मानवाधिकारों के वैश्विक दृष्टिकोण से, यह मामला 'मानवीय गरिमा के उल्लंघन' और 'लैंगिक न्याय के विरुद्ध' माना जाता है, क्योंकि एक महिला को न्याय मांगने के लिए दंडित किया जा रहा है.
अब, जिला प्रशासन और पुलिस की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे पीड़िता को न केवल सुरक्षा प्रदान करें, बल्कि पंचायत के उन सदस्यों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कड़ी कार्रवाई करें जिन्होंने कानून को अपने हाथ में लेकर समानांतर न्याय व्यवस्था चलाने की कोशिश की है.