रेरा में शिकायत के लिए समय सीमा की बाध्यता नहीं- छत्तीसगढ़ HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रियल एस्टेट क्षेत्र में मकान खरीदारों के हितों की रक्षा करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है. न्यायमूर्ति बीडी गुरु की एकल पीठ ने स्पष्ट किया है कि रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) एक विशिष्ट नियामक निकाय है, जिसे पारंपरिक दीवानी अदालतों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.
अदालत ने जोर देकर कहा कि रेरा अधिनियम की धारा 31 के तहत शिकायत दर्ज करने के लिए कोई निश्चित समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है, इसलिए देरी के तकनीकी आधार पर किसी भी खरीदार की शिकायत को खारिज करना न्यायोचित नहीं है.
यह मामला जगदलपुर निवासी निधि साव से जुड़ा है, जिन्होंने दुर्ग जिले के अमलेश्वर स्थित 'ग्रीन अर्थ सिटी' में एक फ्लैट बुक कराया था. बिल्डर द्वारा समय पर कब्जा न देने और निर्माण की गुणवत्ता खराब होने के कारण उन्होंने रेरा की शरण ली थी.
हालांकि, रेरा के आदेश से असंतुष्ट होकर जब उन्होंने अपीलीय ट्रिब्यूनल में गुहार लगाई, तो ट्रिब्यूनल ने शिकायत में 'अत्यधिक देरी' का हवाला देते हुए मामले को सुनने से इनकार कर दिया था. हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के इसी रवैये को गलत ठहराते हुए उसके पुराने आदेश को रद्द कर दिया है.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह साफ किया कि 'लिमिटेशन एक्ट' मुख्य रूप से सामान्य अदालतों पर लागू होता है.
जब तक किसी विशेष कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो, उसे रेरा जैसे निकायों पर थोपा नहीं जा सकता.
अदालत ने अब इस प्रकरण को वापस ट्रिब्यूनल भेज दिया है और निर्देश दिया है कि मामले का निपटारा समय सीमा की तकनीकी बारीकियों के बजाय शिकायत के गुण-दोष और तथ्यों के आधार पर किया जाए. इस फैसले से उन हजारों घर खरीदारों को बड़ी उम्मीद मिली है जो बिल्डरों की मनमानी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.