बिलासपुर के विराट सराफ अपहरण कांड के 5 दोषियों की उम्रकैद बरकरार
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पांच आरोपियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने बिलासपुर के बहुचर्चित विराट सराफ अपहरण कांड के सभी दोषियों की आपराधिक अपीलों को सिरे से खारिज कर दिया.
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक साजिश और फिरौती के लिए अपहरण के आरोपों को अकाट्य डिजिटल, फोरेंसिक और मौखिक साक्ष्यों के जरिए पूरी तरह से साबित किया है. यह मामला साल 2019 का है, जब बिलासपुर के सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र से नौ वर्षीय मासूम विराट का अपहरण कर लिया गया था.
इस पूरी साजिश की मुख्य सूत्रधार पीड़ित की सगी चाची नीता सराफ थी, जिसने अपने कर्ज और वित्तीय संकट को दूर करने के लिए अनिल सिंह नामक व्यक्ति के साथ मिलकर इस खौफनाक वारदात का ताना-बाना बुना था.
अदालत ने मामले की बारीकियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्यक्ष साक्ष्यों के अभाव में भी परिस्थितियों की अटूट कड़ियां दोषियों को सजा दिलाने के लिए पर्याप्त हैं. इस अपराध को अंजाम देने के लिए आरोपियों ने एक ठेले वाले से धोखे से सिम कार्ड हासिल किए और पुराने मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की थी.
अपहरण के बाद मासूम को जशपुर और बिलासपुर के एक बंद मकान में हाथ-पैर बांधकर बंधक बनाकर रखा गया था. इस दौरान आरोपियों ने पीड़ित के पिता से पहले 6 करोड़ रुपये और बाद में बातचीत के बाद 4 करोड़ रुपये की भारी-भरकम फिरौती मांगी थी.
फिरौती के दौरान फोन पर दी गई धमकी, "बच्चे की सलामती चाहते हो तो पैसा का इंतजाम कर लेना, नहीं तो बच्चे को काटकर फेंक देंगे," को कोर्ट ने बेहद गंभीर माना. फोरेंसिक जांच में इस आवाज का मिलान मुख्य आरोपी राजकिशोर से हुआ, जिससे भारतीय दंड संहिता की धारा 364-ए के तहत मौत या गंभीर चोट के भय का कानूनी मापदंड पूरी तरह सिद्ध हो गया.
उच्च न्यायालय ने तकनीकी साक्ष्यों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हुए कहा कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) और साइबर विश्लेषण रिपोर्ट से यह साफ जाहिर होता है कि सभी आरोपियों के मोबाइल लोकेशन वारदात के समय एक साथ बदल रहे थे. पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए 26 अप्रैल 2019 को एक गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी की थी और मासूम विराट को सकुशल मुक्त कराकर दो आरोपियों को मौके से दबोचा था.
निचली अदालत ने 23 सितंबर 2022 को इन सभी को दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया है. अदालत ने अपने विस्तृत विधिक निष्कर्ष में साफ किया कि बच्चों के खिलाफ होने वाले ऐसे जघन्य अपराधों में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती.