बस्तर में अमूल की तर्ज पर बड़े डेयरी मॉडल का एलान
जगदलपुर । संवाददाता: बस्तर संभाग के वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी परिवारों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा मास्टर प्लान तैयार किया है. जगदलपुर में संपन्न हुई मध्य क्षेत्रीय परिषद की उच्च स्तरीय बैठक में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में बस्तर के विकास को लेकर कई दूरगामी निर्णय लिए गए.
इस बैठक में सबसे प्रमुख फैसला बस्तर में सहकारिता पर आधारित एक विशेष डेयरी विकास योजना को लागू करना रहा. गृहमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य स्थानीय जनजातीय परिवारों की आय में तेजी से बढ़ोतरी करना है.
इस महत्वाकांक्षी कार्ययोजना के अंतर्गत बस्तर के प्रत्येक आदिवासी परिवार को राज्य सरकार की ओर से एक गाय और एक भैंस प्रदान की जाएगी. गृहमंत्री अमित शाह के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क को गुजरात के विख्यात 'अमूल मॉडल' के आधार पर विकसित किया जा रहा है.
इसके तहत सुदूर गांवों में दुग्ध संग्रहण केंद्र (मिल्क कलेक्शन सेंटर्स) स्थापित होंगे, अत्याधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट लगाए जाएंगे और दुग्ध उत्पादों की बिक्री के लिए एक मजबूत मार्केटिंग चैन तैयार की जाएगी, जिससे ग्रामीणों को उनके उत्पाद की सही और अधिकतम कीमत मिल सके.
इस विशाल पशुधन वितरण और डेयरी नेटवर्क को धरातल पर उतारने के लिए देश की शीर्ष डेयरी एजेंसियों के साथ औपचारिक समझौता ज्ञापन (MoU) भी किया जा चुका है. आगामी 1 जून से शुरू होने वाली इस योजना से छत्तीसगढ़ के करीब 16 लाख आदिवासी परिवारों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है.
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदायों को दुधारू पशु वितरित करने का इतिहास पुराना रहा है, जिसकी शुरुआत सबसे पहले साल 2003 में तत्कालीन रमन सिंह सरकार के घोषणा पत्र से हुई थी, हालांकि बाद में यह रखरखाव और वितरण की कमियों के कारण विवादों में घिर गई थी.
इसके बाद जून 2025 में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने 'दुधारू पशु प्रदाय योजना' के जरिए इसे नए सिरे से पुनर्जीवित किया. शुरुआत में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कांकेर, कोंडागांव और जशपुर सहित छह जिलों की 325 आदिवासी महिलाओं को 650 साहीवाल गायें बांटी गईं, जिसका विस्तार इस साल अप्रैल में सभी सामाजिक वर्गों के लिए कर दिया गया था.
अब केंद्रीय नेतृत्व के सहयोग से इस योजना को बेहद वृहद स्वरूप दिया जा रहा है.
वर्तमान में छत्तीसगढ़ प्रतिदिन लगभग 59 से 60 लाख लीटर दूध उत्पादन की क्षमता रखता है, जिसे और बढ़ाने के लिए राज्य में पहले से ही पांच महत्वपूर्ण योजनाएं संचालित हैं. इनमें राष्ट्रीय गोकुल मिशन और देवभोग का व्यापक नेटवर्क शामिल है, जिससे 90 हजार से अधिक दुग्ध उत्पादक जुड़े हुए हैं.
इसके अतिरिक्त, बस्तर और सरगुजा संभाग में संगठित मिल्क रूट तैयार करने के लिए एनडीडीबी के सहयोग से 'श्वेत क्रांति' पायलट प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है.
वहीं, राज्य सरकार की 'सुरभि गौधाम योजना' पारंपरिक गोठानों को आधुनिक डेयरी से जोड़ रही है. इसके साथ ही राष्ट्रीय डेयरी विकास कार्यक्रम और डेयरी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड (DIDF) के माध्यम से प्रदेश में मिल्क प्रोसेसिंग व कैटल फीड प्लांट लगाने के लिए उद्यमियों को रियायती दरों पर ऋण भी उपलब्ध कराया जा रहा है.