कांकेर: सोनपाल गाँव में आज भी कंधों पर चल रही है शिक्षा
कांकेर । संवाददाता: "दुनिया चाँद तक पहुँच गई है, लेकिन हम आज भी अपने बच्चों को स्कूल पहुँचाने के लिए कंधों पर उठाकर नाला पार कराने को मजबूर हैं." उत्तर बस्तर कांकर ज़िले के दुर्गूकोंदल ब्लॉक स्थित दूरस्थ सोनपाल गाँव के ग्रामीणों का यह दर्द आठ दशकों के उस अधूरे इंतज़ार की दास्तान बयाँ करता है, जो हर चुनाव में वादों के तले दब जाता है.
आज़ादी के 78 साल बाद भी एक अदद पुल की राह तक रहे इस गाँव के लिए यह सिर्फ़ लोहे और कंक्रीट का ढाँचा भर नहीं है, बल्कि मानसून के चार महीनों में ज़िंदगी और मौत के बीच का अंतर है.
हाल ही में सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में ग्रामीण उफनते नाले के बीच अपने बच्चों को कंधों पर लादकर पार कराते दिख रहे हैं. गाँव की महिलाओं का कहना है कि वे गुहार लगाने राज्य की राजधानी तक भी गईं, लेकिन नतीजा सिफ़र रहा.
स्थिति यह है कि बारिश के दिनों में बीमारों तक एम्बुलेंस नहीं पहुँच पाती, बच्चों की पढ़ाई ठप हो जाती है और कई बार पानी के तेज़ बहाव में उनकी किताबें और बस्ते बह जाते हैं.
दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि लगभग तीन साल पहले करोड़ों रुपये की लागत से 2.3 किलोमीटर लंबी डामर सड़क बनाई गई थी. यह सड़क नाले के दोनों ओर तो मौजूद है, लेकिन बीच में पुल न होने से बारिश आते ही इसका संपर्क पूरी तरह कट जाता है.
गाँव के सरपंच सानूराम दुग्गा और स्थानीय महिलाओं का कहना है कि पीढ़ियाँ बीत गईं, वादे होते रहे लेकिन पुल कभी नहीं बना. इस मामले में सेतु निर्माण निगम के उप-अभियंता महेंद्र सिंह ठाकुर का कहना है कि सोनपाल पुल को वर्ष 2026-27 के बजट में शामिल किया गया है और इसका नया प्राकलन (एस्टिमेट) तैयार कर आगे की कार्रवाई के लिए भेजा जाएगा.
हालाँकि, सोनपाल के ग्रामीणों के लिए काग़ज़ी एस्टिमेट अब भी पुल बनने की गारंटी नहीं है.