शुक्र, 06 नव. 2026

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क्या दक्षिणपंथी लहर पर विराम? अमेरिका से ब्राजील तक बदल रहा सियासी मिजाज

अमेरिका और ब्राजील के चुनावों ने वैश्विक राजनीति के स्थापित रुझानों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. महंगाई, रोजगार और बुनियादी जरूरतों पर जनता के कसते रुख ने दक्षिणपंथी ताकतों के विजय रथ को चुनौती दी है.

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06 नव. 2026, 11:02 AM 3 मिनट में पढ़ें 62

लूला डा सिल्वा- ब्राजील के राष्ट्रपति
लूला डा सिल्वा- ब्राजील के राष्ट्रपति

नई दिल्ली । डेस्क: लगभग दस दिनों के भीतर अमेरिका महाद्वीप के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों ने दक्षिणपंथी लोकलुभावन राजनीति को करारा झटका दिया है. ब्राजील में लुइज़ इनासिओ लूला डा सिल्वा ने पहले दौर में पिछड़ने के बाद रन-ऑफ चुनाव में पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लेवियो बोल्सोनारो को शिकस्त देकर वापसी की है. वहीं, अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" आंदोलन की लहर पर सवार उम्मीदवारों को दरकिनार करते हुए मतदाताओं ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों का नियंत्रण डेमोक्रेट्स को सौंप दिया है.

यह नतीजे पिछले एक दशक से हावी दिख रही दक्षिणपंथी लहर को सीधी चुनौती देते हैं. विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति सत्ता विरोधी माहौल का भी नतीजा हो सकती है, जहां जनता महंगाई, रोजगार और बुनियादी जरूरतों पर नाकाम रहने वाले नेताओं को सबक सिखा रही है.

'इंस्टीट्यूट फॉर पॉलिसी स्टडीज' के थिंक टैंक 'फॉरेन पॉलिसी इन फोकस' के निदेशक जॉन फेफ़र के मुताबिक, सोशल मीडिया के दौर में मतदाता बदलाव का वादा करने वाले उम्मीदवारों पर दांव लगा रहे हैं, जिससे राजनीतिक पेंडुलम एक छोर से दूसरे छोर की तरफ झूल रहा है. हालांकि, उनका यह भी कहना है कि सुदूर-दक्षिणपंथी आंदोलन लोकतांत्रिक मानदंडों को कमजोर करने का जोखिम खड़ा करता है.

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यूरोप पर टिकी नजरें: क्या स्पेन में थमेगा दक्षिणपंथी उभार?

अमेरिकी मध्यवर्ती चुनाव के नतीजों के बाद अब सभी की निगाहें स्पेन पर टिकी हैं. स्पेन के कार्यवाहक प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने इन नतीजों को दक्षिणपंथी लहर के कमजोर होने का संकेत बताया है. सांचेज़, जो खुद आगामी आम चुनाव में राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, का मानना है कि अमेरिका और ब्राजील के बाद अब स्पेन में भी ऐसा ही बदलाव देखने को मिलेगा.

इसके विपरीत, यूरोप के अन्य हिस्सों में दक्षिणपंथी आंदोलन अब भी मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं. फ्रांस में मरीन ले पेन की 'नेशनल रैली' मुख्यधारा में मजबूत जगह बना चुकी है, जबकि जर्मनी में 'अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' (AfD) ने ऐतिहासिक बढ़त हासिल कर पारंपरिक राजनीति को चुनौती दी है.

डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय दक्षिणपंथ के बीच दूरी

हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय दक्षिणपंथी नेताओं के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन अमेरिकी चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को मिले झटके के बाद यूरोपीय नेताओं ने उनसे दूरी बनाना शुरू कर दिया है. जर्मनी की AfD नेता एलिस वीडेल ने विदेशी मामलों में हस्तक्षेप न करने के अपने वादे को तोड़ने के लिए ट्रंप की आलोचना की है.

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप के साथ गठबंधन अब यूरोपीय राष्ट्रवादियों के लिए फायदेमंद नहीं रहा. इसके अलावा, कनाडा में लिबरल पार्टी के मार्क कार्नी द्वारा ट्रंप समर्थित कंजर्वेटिव नेता पियरे पोलिवरे की हार और लैटिन अमेरिका में जोस एंटोनियो कास्ट व रोड्रिगो पाज़ जैसे दक्षिणपंथी नेताओं की घटती लोकप्रियता यह दर्शाती है कि लैटिन अमेरिका में भी यह बदलाव उतना स्थायी नहीं है जितना माना जा रहा था.

ब्रेक्जिट की सीख और अर्थशास्त्र का 'पॉपुलिस्ट चक्र'

2016 के ब्रेक्जिट और ट्रंप के उभार के साथ शुरू हुए इस राजनीतिक आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीयता और वैश्वीकरण को खारिज किया था. 

हालांकि, शासन चलाने की व्यावहारिक वास्तविकताओं के आगे यह वादे टिक नहीं पा रहे हैं. 'लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स' के प्रोफेसर जॉन वान रीनेन ने इसे "पॉपुलिस्ट डूम लूप" (लोकलुभावन तबाही का चक्र) कहा है, जहां कमजोर आर्थिक नीतियों के कारण विकास दर धीमी होती है और मतदाता असंतोष बढ़ता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक मध्यमार्गी और वामपंथी दल आम जनता को वास्तविक लाभ पहुंचाने वाला नया अंतरराष्ट्रीय ढांचा तैयार नहीं करते, तब तक हार के बावजूद वैश्वीकरण विरोधी आंदोलनों का जनाधार पूरी तरह समाप्त होना कठिन है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP