चुनाव आयोग में बहुमत का नियम, अकेले CEC नहीं ले सकते फैसला: पूर्व CEC एस.वाई. कुरैशी
हाशिम अब्दुल हलीम मेमोरियल लेक्चर में पूर्व CEC एस.वाई. कुरैशी ने स्पष्ट किया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त अकेले चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व नहीं करते. आयोग के निर्णय सर्वसम्मति या दो आयुक्तों के बहुमत से ही मान्य होते हैं.
कोलकाता । डेस्क: कोलकाता के जीडी बिड़ला सभागार में आयोजित हाशिम अब्दुल हलीम मेमोरियल लेक्चर को संबोधित करते हुए भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) एस.वाई. कुरैशी ने चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त अकेले पूरे चुनाव आयोग का निर्माण नहीं करते हैं, बल्कि आयोग के तीन निर्वाचन आयुक्तों में से कोई भी दो आयुक्त मिलकर चुनाव आयोग का गठन करते हैं.
पूर्व CEC एस.वाई. कुरैशी ने कहा कि चुनाव आयोग में निर्णय लेने का मुख्य आधार सर्वसम्मति है. यदि सर्वसम्मति संभव न हो, तो फैसला बहुमत से होना अनिवार्य है. इसका सीधा अर्थ यह है कि CEC सहित तीन में से दो आयुक्तों की सहमति से ही चुनाव आयोग बनता है. यदि CEC किसी निर्णय में अल्पमत में हैं, तो वे चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.
एक मीडिया रिपोर्ट का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि मई से अगस्त के बीच चुनाव आयोग की कोई बैठक नहीं हुई, ऐसे में सर्वसम्मति या बहुमत का सवाल ही पैदा नहीं होता. इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि दो निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने CEC ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर अकेले लिए गए फैसलों पर 10 महीनों में 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं.
इन आपत्तियों का मुख्य केंद्र विवादित एसआईआर (SIR) के दौरान की गई कार्रवाई थी, जिसके तहत 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे.
इसके अलावा, मतदाता पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 में बदलाव, दिल्ली में मतदाता सूची सॉफ्टवेयर का केंद्रीयकरण, साथी आयुक्तों को जानकारी न देना, आयोग की मंजूरी के बिना काम के बंटवारे का आदेश जारी करना और बंगाल में 16.10 लाख अनधिकृत या फर्जी अपीलों जैसे मुद्दे शामिल थे.
जुलाई 2010 से जून 2012 तक CEC रहे एस.वाई. कुरैशी ने बहुमत के फैसले को समझाने के लिए 2008 के जम्मू और कश्मीर विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया. उस समय एन. गोपालस्वामी CEC थे और कुरैशी व नवीन चावला अन्य दो आयुक्त थे. अमरनाथ भूमि हस्तांतरण विवाद और विरोध प्रदर्शनों के बीच मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति शासन लागू था. चुनाव से पहले जब आयोग ने कश्मीर का दौरा किया, तो मेहबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला जैसे नेताओं ने हिंसा के कारण चुनाव कराने को असंभव बताया था.
तत्कालीन CEC गोपालस्वामी भी चुनाव टालने के पक्ष में दिख रहे थे, लेकिन अन्य दो आयुक्तों (कुरैशी और चावला) का मानना था कि चुनाव निर्धारित समय पर ही होने चाहिए. इसके बाद CEC ने बहुमत के इस फैसले को स्वीकार किया और इसे सर्वसम्मत निर्णय के रूप में पेश करते हुए आगे बढ़कर नेतृत्व किया, जिसके परिणामस्वरूप उस चुनाव में 60% से अधिक मतदान हुआ.
बंगाल एसआईआर में बड़े पैमाने पर हटाए गए नामों के सवाल पर कुरैशी ने बताया कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है. कई निर्वाचन क्षेत्रों में लाखों वोट गलत तरीके से हटाए जाने की आशंका व्यक्त की गई है और सुप्रीम कोर्ट इस पर जल्द ही अपना रुख साफ करेगा. इस कार्यक्रम में छात्र कार्यकर्ता आयशी घोष, माकपा नेता बिकास रंजन भट्टाचार्य और हाशिम अब्दुल हलीम के परिवार के सदस्य शामिल हुए.