‘इंटरनेट ऑफ बीइंग्स’: जब मानव शरीर सीधे इंटरनेट से जुड़ेगा
रायपुर । संवाददाता: कभी विज्ञान-फंतासी मानी जाने वाली कल्पनाएँ अब धीरे-धीरे हकीकत का रूप ले रही हैं. 1966 की चर्चित फिल्म फैंटास्टिक वॉयेज में दिखाया गया था कि एक अंतरिक्ष यान और उसके चालक दल को सूक्ष्म आकार में बदलकर इंसान के शरीर के भीतर भेजा जाता है, ताकि मस्तिष्क में जमे खतरनाक थक्के को हटाया जा सके.
उस दौर में यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक लगती थी, लेकिन आज वैज्ञानिक जिस दिशा में काम कर रहे हैं, वह इसी कल्पना को आधुनिक तकनीक के सहारे साकार करने की ओर बढ़ रही है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि इंटरनेट के विकास का अगला और शायद अंतिम चरण ‘इंटरनेट ऑफ बीइंग्स’ हो सकता है. पहले चरण में कंप्यूटर आपस में जुड़े, दूसरे में रोजमर्रा की चीजें (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) नेटवर्क का हिस्सा बनीं, और अब तीसरे चरण में मानव शरीर के अंग सीधे डिजिटल नेटवर्क से जुड़ सकते हैं.
हाल ही में दुबई में आयोजित ‘प्रोटोटाइप्स फॉर ह्यूमैनिटी’ सम्मेलन में जुटे प्राकृतिक विज्ञान के विशेषज्ञों ने कहा कि यह परिकल्पना अब तकनीकी रूप से संभव होती दिख रही है.
इस बदलाव के प्रभाव केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि व्यक्ति, उद्योग और समाज तीनों स्तरों पर गहरे असर डालेंगे. जहां एक ओर सिलिकॉन वैली के कुछ अरबपति अमरता का सपना देख रहे हैं, वहीं साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि शरीर के डिजिटल होने से हैकिंग के खतरे अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ सकते हैं.
बीमारी से पहले चेतावनी
‘इंटरनेट ऑफ बीइंग्स’ का पहला बड़ा असर स्वास्थ्य निगरानी पर पड़ेगा. शरीर के भीतर मौजूद सूक्ष्म सेंसर लगातार स्वास्थ्य से जुड़े संकेतों पर नजर रख सकेंगे. इससे बीमारी के लक्षण गंभीर होने से पहले ही पहचान में आ जाएंगे. इलाज की तुलना में रोकथाम सस्ती और प्रभावी होती है.
ऐसे में दवाओं की जगह खानपान में बदलाव, व्यक्तिगत व्यायाम योजनाएं और जीवनशैली सुधार जैसे उपाय ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं.
आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में हर साल होने वाले करीब 8 लाख हार्ट अटैक में से लगभग 1.7 लाख ‘साइलेंट’ होते हैं, जिनके लक्षण लोग पहचान ही नहीं पाते. समय पर अलर्ट मिलने से लाखों जानें बचाई जा सकती हैं.
इलाज करने वाले बायोरॉबोट्स
दूसरा बड़ा बदलाव यह होगा कि ये सेंसर केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि सक्रिय रूप से इलाज भी कर सकेंगे. वैज्ञानिक इन्हें ‘बायोरॉबोट्स’ कह रहे हैं, जो संभवतः जैल जैसे पदार्थ से बने होंगे. ये रक्त के थक्के का पता लगते ही दवा छोड़ सकते हैं, वायरस के हमले पर वैक्सीन को सक्रिय कर सकते हैं और भविष्य में जीन-एडिटिंग तकनीक के जरिए क्षतिग्रस्त डीएनए की मरम्मत तक कर सकते हैं.
कोविड-19 के दौरान विकसित mRNA वैक्सीन को इस दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि आगे चलकर सूक्ष्म स्तर की ‘माइक्रोसर्जरी’ भी संभव होगी.
तीसरा और सबसे क्रांतिकारी असर मेडिकल रिसर्च और दवा खोज की प्रक्रिया पर पड़ेगा. अभी वैज्ञानिक पहले अनुमान लगाते हैं, फिर वर्षों तक महंगे क्लिनिकल ट्रायल करते हैं. ‘इंटरनेट ऑफ बीइंग्स’ के दौर में यह प्रक्रिया उलट सकती है. विशाल डेटा के आधार पर पहले यह पता चलेगा कि कौन सा उपाय काम कर रहा है, और फिर वैज्ञानिक यह समझेंगे कि क्यों.
इससे दवाएं तेजी से, कम लागत में और ज्यादा सटीक तरीके से विकसित हो सकेंगी. ‘वन साइज फिट्स ऑल’ इलाज की जगह पूरी तरह व्यक्तिगत चिकित्सा का दौर आएगा, जहां दवा की खुराक भी शरीर के तापमान, नींद और दैनिक बदलावों के अनुसार तय होगी.
डिजिटल ट्विन और नई चिकित्सा परिभाषा
भविष्य में ‘डिजिटल ट्विन’ यानी शरीर का आभासी मॉडल भी आम हो सकता है, जो वास्तविक समय के स्वास्थ्य डेटा से लगातार अपडेट होगा. इन मॉडलों के जरिए बीमारी के आने से पहले ही उसके असर को समझा जा सकेगा और इलाज का परीक्षण किया जा सकेगा.
हालांकि इस तकनीक से उम्मीदें जितनी बड़ी हैं, चिंताएं भी उतनी ही गंभीर हैं. सवाल यह है कि शरीर के डिजिटलीकरण के साथ कहीं हम अपनी निजता और मानवता तो नहीं खो देंगे. ‘इंटरनेट ऑफ बीइंग्स’ मानव इतिहास की सबसे रोमांचक तकनीकी संभावनाओं में से एक है, लेकिन इसे बेहद सावधानी और नैतिकता के साथ आगे बढ़ाने की जरूरत होगी.
आज इंसान एक बार फिर अनजाने क्षेत्र की यात्रा पर निकल रहा है लेकिन इस बार बाहरी अंतरिक्ष नहीं, बल्कि खुद उसका अपना शरीर ही नया ब्रह्मांड बनने वाला है. (Symbolic Photo)