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बस्तर में टीबी इलाज से बड़ी चुनौती है दूरी

जब दूरी TB इलाज में रुकावट बन जाए

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28 जुल. 2026, 08:11 AM 15 मिनट में पढ़ें 1

टीबी, दूरी, आदिवासी
टीबी, दूरी, आदिवासी

रायपुर | आयुषी शर्मा: 26 अप्रैल 2026 की सुबह, कांकेर ज़िले के बिनागुड़ा गाँव के ग्रामीणों ने 42 साल की लक्ष्मी मंडावी को एक खाट पर लिटाया और हेल्थ सेंटर की ओर चल पड़े. वे एम्बुलेंस का लगभग दो घंटे तक इंतज़ार कर चुके थे, लेकिन कोई एम्बुलेंस नहीं आई. कोई और रास्ता न होने पर, वे उन्हें जंगल के रास्ते 19 किलोमीटर दूर छोटेबेटिया BSF कैंप ले गए, ताकि मदद मिल सके. वहाँ से एक एम्बुलेंस उन्हें पखांजूर के सिविल हॉस्पिटल ले गई. जब तक वे हॉस्पिटल पहुँचीं, लक्ष्मी की मौत हो चुकी थी.


2018 में पति की मौत के बाद लक्ष्मी कांकेर ज़िले के बिनागुड़ा गांव में अपनी दो बेटियों के साथ रहती थीं. उन्हें सेहत से जुड़ी परेशानियाँ बहुत पहले, मार्च 2022 में शुरू हुई थीं, एक सुबह जब वे जंगल में महुआ इकट्ठा कर रही थीं. उन्हें कमज़ोरी महसूस होने लगी, लगातार खाँसी और साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी, लेकिन थोड़ी देर आराम करने के बाद वे ठीक हो गईं. जैसे-जैसे महीने गुज़रे, ये तकलीफ़ उन्हे बार-बार होने लगीं और धीरे-धीरे उनका वज़न कम होने लगा.


अपनी सेहत के प्रति लापरवाही, आर्थिक तंगी और हेल्थकेयर सुविधाओं के दूर होने के कारण, उनका परिवार समय पर उनकी सही जाँच नहीं करवा पाया. गाँव के पास प्राइमरी हेल्थकेयर सुविधाएँ सीमित थीं, और हॉस्पिटल तक पहुँचने के लिए मुश्किल रास्तों से लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी.


जब एक दिन उनकी हालत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई, तब पास के गांव में रहने वाली आशा वर्कर ने उनके लक्षण देखकर बलगम का सैंपल लिया और उसे टेस्टिंग सेंटर भेजा, जहाँ उन्हें ड्रग-रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (DR-TB) होने का पता चला.


पति की मौत के बाद से, लक्ष्मी ही अपनी दो बेटियों की परवरिश और घर संभालने की ज़िम्मेदारी उठा रही थीं. जैसे-जैसे उनकी बीमारी बढ़ी, दूर के हेल्थ सेंटरों तक बार-बार जाना मुश्किल होता गया. हॉस्पिटल की लंबी दूरी, दवाएँ मिलने में देरी, इलाज में रुकावट और गाँव वालों से मिलने वाला सामाजिक अलगाव - इन सबने धीरे-धीरे उनकी सेहत पर बुरा असर डाला. अप्रैल 2026 तक, इलाज के लिए जाना भी बीमारी जितना ही खतरनाक हो गया था.


लक्ष्मी की मौत कोई अकेली घटना नहीं है. बस्तर के आदिवासी गाँवों में, टीबी के इलाज में सबसे बड़ी रुकावट सिर्फ़ बीमारी नहीं है, बल्कि मरीज़ों को जाँच और इलाज के लिए तय करनी पड़ने वाली लंबी दूरी भी है.


दूरी, जो किलोमीटर से कहीं ज़्यादा है


भारत के कई हिस्सों में, खासकर छत्तीसगढ़ में, सबसे बड़ी चुनौती अक्सर बीमारी खुद नहीं, बल्कि इलाज तक पहुँचने का लंबा और मुश्किल सफ़र होता है. 'द लैंसेट' के अनुसार, लोग मामूली इलाज के लिए भी लगभग 15 किलोमीटर और अस्पताल में भर्ती होने के लिए 40 किलोमीटर से ज़्यादा का सफ़र करते हैं. छत्तीसगढ़ में हाल ऐसा है कि अस्पताल या डॉक्टर तक पहुँचना आज भी किसी परीक्षा से कम नहीं है. सरकारी दावे चाहे कितने भी बड़े हों, लेकिन हकीकत यह है कि अव्वल तो अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, डॉक्टर हैं तो दवा नहीं है, दवा है तो जांच की सुविधा नहीं है.


इस रिसर्च में यह बात सामने आई है कि छत्तीसगढ़ के केवल 30 फीसदी बुजुर्गों को ही 10 किलोमीटर की दूरी के भीतर इलाज मिल पाता है. यानी दस में से सात बुज़ुर्ग ऐसे हैं जिन्हें गंभीर बीमारी की हालत में भी लंबा सफ़र तय करना पड़ता है. और यह सफ़र शहर की चिकनी सड़कों पर नहीं, बल्कि जंगल, कच्चे रास्तों, पहाड़ियों और कई बार नदियों के बीच से होकर गुजरता है.


लैंसेट की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि जैसे-जैसे अस्पताल की दूरी बढ़ती है, वैसे-वैसे इलाज कराने की संभावना घटती जाती है. 10 किलोमीटर के भीतर जहाँ इलाज कराने वालों की संख्या अधिक है, वहीं 30 किलोमीटर के बाद यह तेजी से गिर जाती है. छत्तीसगढ़ में इसका मतलब यह है कि बहुत से बुज़ुर्ग इलाज इसलिए नहीं कराते क्योंकि वे लापरवाह हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे सिस्टम, सफ़र और इंतज़ार से थक चुके हैं.


यह दूरी सिर्फ़ भौगोलिक नहीं, सामाजिक भी है. छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में बुज़ुर्ग आदिवासी हैं, जिनके लिए अस्पताल सिर्फ़ दूर ही नहीं, बल्कि अजनबी भी है. भाषा अलग, माहौल अलग, व्यवहार अलग. ऐसे में बीमारी को सह लेना कई बार इलाज कराने से आसान लगता है. रिपोर्ट बताती है कि महिलाएँ, अकेले रहने वाले बुज़ुर्ग और गरीब लोग दूरी से सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं. छत्तीसगढ़ में ये तीनों वर्ग बड़ी संख्या में मौजूद हैं. यानी यहाँ दूरी का असर सिर्फ़ आँकड़ों में नहीं, बल्कि ज़िंदगियों में दिखता है.

यहाँ असली सवाल यह नहीं होता कि इलाज मुफ़्त है या नहीं, बल्कि यह होता है कि "मैं वहाँ तक पहुँच भी पाऊँगा या नहीं?" छत्तीसगढ़ के कई गाँवों में यह सवाल आज भी रोज़मर्रा की हकीकत है.


खराब सड़कें, अनियमित पब्लिक ट्रांसपोर्ट, सीमित एम्बुलेंस सेवाएँ और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का कुछ ज़िला अस्पतालों व मेडिकल कॉलेजों तक सीमित होना इस चुनौती को और बढ़ा देता है. कई परिवारों के लिए अस्पताल पहुँचने का मतलब है एक दिन की मज़दूरी का नुकसान, आने-जाने के लिए उधार लेना या बीमारी के असहनीय होने तक इलाज टालते रहना. जैसा कि 'द लैंसेट' बताता है, स्वास्थ्य सेवा जितनी दूर होती है, लोगों के इलाज कराने की संभावना उतनी ही कम हो जाती है—ऐसा इसलिए नहीं कि वे इलाज नहीं करवाना चाहते, बल्कि इसलिए कि सफ़र ही सबसे बड़ी रुकावट बन जाता है.


लेकिन बस्तर में दूरी को सिर्फ़ किलोमीटर में नहीं मापा जा सकता.


शहरों में जहाँ 20 किलोमीटर का सफ़र एक घंटे से भी कम समय में पूरा हो सकता है, वहीं बस्तर के दूर-दराज़ गाँवों में उतनी ही दूरी का मतलब कई घंटों तक जंगलों में पैदल चलना, नदियों-नालों को पार करना, दिन भर में चलने वाली इकलौती साझा गाड़ी का इंतज़ार करना या सरकारी वाहन न मिलने पर महँगा निजी परिवहन करना हो सकता है. कई अंदरूनी गाँवों में मोबाइल नेटवर्क ठीक से काम नहीं करता, जिससे आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस बुलाना या मदद माँगना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे हालात में मरीजों को अक्सर खाट पर लिटाकर कई किलोमीटर दूर स्वास्थ्य केंद्रों तक ले जाना पड़ता है. इलाज मिलने में होने वाली इस देरी के कारण कई बार मरीजों की रास्ते में या अस्पताल पहुँचने से पहले ही मौत हो जाती है.


मानसून के दौरान उफनती नदियाँ और कीचड़ भरी सड़कें अक्सर पूरे गाँवों का संपर्क काट देती हैं, जिससे मरीजों को अस्पताल जाने की योजना टालनी पड़ती है. रोज़ाना मज़दूरी करने वाले परिवारों के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक जाना केवल आने-जाने और खाने-पीने का खर्च नहीं, बल्कि एक दिन की कमाई का नुकसान भी है. टीबी (तपेदिक) के मरीज के लिए यह सफ़र सिर्फ़ एक बार नहीं होता; जाँच, दवाइयों और फ़ॉलो-अप देखभाल के लिए कई महीनों तक बार-बार यही रास्ता तय करना पड़ता है. इसलिए बस्तर में दूरी को सिर्फ़ किलोमीटर में नहीं, बल्कि समय, खोई हुई मज़दूरी, शारीरिक थकान और इलाज में होने वाली देरी के रूप में भी मापा जाता है.


ऐसी ही एक कहानी दंतेवाड़ा ज़िले के अंदरूनी गाँव बारसूर की रहने वाली 28 साल की सरस्वती ओयाम की है.


सरस्वती ने शादी के दो साल बाद, 2023 में अपने पहले बच्चे को जन्म दिया. बच्चा कुपोषित पैदा हुआ, क्योंकि सरस्वती खुद लंबे समय से कुपोषण की शिकार थीं. परिवार की आर्थिक हालत खराब होने के कारण उन्हें अक्सर पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाता था. आज भी, बस्तर के कई गांवों में सही और संतुलित पोषण न मिलने की वजह से कुपोषण एक आम समस्या बनी हुई है.


फरवरी 2025 में बच्चे के जन्म के बाद, सरस्वती को लगातार कमजोरी और थकान महसूस होने लगी. हिम्मत जुटाकर उन्होंने अपने पति को अपनी हालत के बारे में बताया. कई आदिवासी परिवारों की तरह, उन्होंने भी सबसे पहले एक पारंपरिक वैद्य से मदद ली.


पारंपरिक वैद्यों के पास कोई औपचारिक मेडिकल ट्रेनिंग नहीं होती, लेकिन स्थानीय समुदायों के साथ उनके गहरे जुड़ाव और आसानी से उपलब्ध होने व भरोसेमंद होने के कारण, कई आदिवासी समुदायों में उन्हें ही इलाज के लिए प्राथमिकता दी जाती है. लेकिन सरस्वती की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. परिवार के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली (सरकारी अस्पताल) से मदद लेने का फैसला करने में लगभग चार महीने बीत गए.


धीरे-धीरे उनकी सेहत बिगड़ती गई. उन्होंने ठीक से खाना-पीना छोड़ दिया, वे और कमजोर हो गईं और सामाजिक जीवन से दूर रहने लगीं; अक्सर वे अपनी बीमारी की गंभीरता को परिवार से छिपाती रहीं.


आखिरकार, उन्हें एक स्वास्थ्य शिविर में ले जाया गया, जहाँ उनके बलगम की जांच की गई. लगभग एक हफ्ते बाद, नतीजों से पुष्टि हुई कि उन्हें ड्रग-रेसिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (DR-TB) है.


इसके साथ ही एक और भी मुश्किल सफर की शुरुआत हुई.

 

मुफ़्त इलाज तक मुश्किल पहुँच


हालांकि नेशनल TB एलिमिनेशन प्रोग्राम (NTEP) के तहत टीबी की दवाएं मुफ़्त मिलती हैं, लेकिन इलाज तक पहुँचना बिल्कुल भी मुफ़्त नहीं था. हर बार इलाज के लिए जाने पर सरस्वती और उनके पति को 'डेज़िग्नेटेड माइक्रोस्कोपी सेंटर' (DMC) तक जाने में पूरा दिन लग जाता था. यह सबसे निचली स्तर की डायग्नोस्टिक यूनिट होती है, जहाँ सैंपल को ऊँचे स्तर की सुविधाओं के लिए भेजने से पहले बलगम की जाँच की जाती है.


PHC तक पहुँचना ही बहुत थका देने वाला काम था. ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गाँव से वहाँ तक जाने में अक्सर पूरा दिन लग जाता था. उनके पति को हर बार उनके साथ जाना पड़ता था, जिसका मतलब था कि उन्हें एक दिन की दिहाड़ी का नुकसान होता था और साथ ही ट्रांसपोर्ट का खर्च परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ाता था.


टीबी का इलाज अस्पताल में एक बार जाने से नहीं होता, बल्कि यह एक लंबी प्रक्रिया है जो कम से कम छह महीने तक चलती है, और ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी (DR-TB) वाले मरीज़ों के लिए तो और भी लंबी होती है. बीमारी का पता लगाने के लिए CBNAAT या TrueNat जैसे मॉलिक्यूलर टेस्ट के ज़रिए बलगम की जाँच करानी पड़ती है. इसके बाद दवा लेने, फ़ॉलो-अप जाँच, बलगम की निगरानी, ​​पोषण संबंधी मदद और साइड इफ़ेक्ट के इलाज के लिए बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है. बस्तर के मरीज़ों के लिए, इन हर यात्रा का मतलब अक्सर लंबी दूरी तक पैदल चलना, ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम करना, रोज़ की कमाई गँवाना और मुश्किल रास्तों पर घंटों सफ़र करना होता है. नतीजतन, दूरी पूरे इलाज के दौरान एक बार-बार आने वाली बाधा बन जाती है, जिससे इलाज में देरी होती है और इलाज बीच में ही रुकने का खतरा बढ़ जाता है.

 

बीमारी की पहचान तक का सफ़र


सरस्वती के लिए, यह सफ़र सिर्फ़ अस्पताल जाने से कहीं ज़्यादा था. घर से निकलने से पहले, उन्हें अपने छोटे बच्चे, घर के अधूरे कामों और गंभीर रूप से बीमार होने के बावजूद सफ़र करने से होने वाली शारीरिक तकलीफ़ की चिंता सताती थी. अस्पताल का हर चक्कर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से एक संघर्ष बन जाता था.


हेल्थकेयर सिस्टम अक्सर स्थिति को और खराब कर देता था. अस्पताल पहुँचने के बाद भी, कभी-कभी हेल्थकेयर वर्कर नहीं मिलते थे, मरीज़ों को घंटों इंतज़ार करना पड़ता था, कभी-कभी दवाएँ खत्म हो जाती थीं, या उन्हें किसी और दिन आने के लिए कह दिया जाता था.


नतीजतन, दंतेवाड़ा ज़िला अस्पताल तक लंबी दूरी तय करने के बावजूद, सरस्वती कभी-कभी बिना पूरा इलाज कराए घर लौट आती थीं. बार-बार आने वाली इन रुकावटों की वजह से लगातार इलाज जारी रखना मुश्किल होता जा रहा था.


हालाँकि टीबी की दवाएँ मुफ़्त हैं, लेकिन इलाज का छिपा हुआ खर्च बहुत ज़्यादा होता है. हर चक्कर में आने-जाने का खर्च, रोज़ की कमाई का नुकसान और मरीज़ के साथ किसी का जाना शामिल होता है. रोज़ाना की कमाई पर गुज़ारा करने वाले परिवारों के लिए, ये अप्रत्यक्ष खर्च अक्सर बीमारी का पता लगाने में देरी और इलाज में रुकावट का कारण बनते हैं. इसका बोझ सबसे ज़्यादा आदिवासी महिलाओं पर पड़ता है.


टीबी के इलाज में पोषण भी अहम भूमिका निभाता है, और छत्तीसगढ़ में टीबी और कुपोषण दोनों की दोहरी मार पड़ रही है.


आदिवासी गाँवों में महिलाएँ खाना पकाने, जलावन की लकड़ी और पानी इकट्ठा करने, खेतों में काम करने और बच्चों व परिवार के बुज़ुर्ग सदस्यों की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी निभाती हैं. स्वास्थ्य केंद्रों तक लंबी दूरी तय करने का मतलब अक्सर इन ज़िम्मेदारियों को पीछे छोड़ना होता है. कई महिलाएँ साथ जाने के लिए परिवार के पुरुष सदस्यों पर भी निर्भर रहती हैं, जिससे इलाज न केवल उनकी अपनी सेहत पर, बल्कि किसी और की उपलब्धता और परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर हो जाता है.


गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के बाद यह चुनौती और भी बढ़ जाती है, जब महिलाएँ पहले से ही पोषण की कमी के कारण कमज़ोर होती हैं. लंबी यात्राओं के कारण समय पर बीमारी का पता लगाने और नियमित फ़ॉलो-अप में रुकावट आती है, जिससे कई महिलाएँ लक्षण गंभीर होने पर ही इलाज कराती हैं. इससे न केवल ठीक होने की संभावना कम हो जाती है, बल्कि घर के अंदर बीमारी फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है.


दूरी कोई एक बार की बाधा नहीं है, बल्कि टीबी के इलाज के दौरान बार-बार आने वाली समस्या है. मरीज़ों को बलगम की जाँच, मॉलिक्यूलर टेस्ट (जैसे CBNAAT या TrueNat), छाती का एक्स-रे, दवा लेने, इलाज के असर की निगरानी और साइड इफ़ेक्ट को संभालने के लिए बार-बार यात्रा करनी पड़ती है. DR-TB (दवा-प्रतिरोधी टीबी) वाले मरीज़ों के लिए ये चक्कर और भी ज़्यादा लगाने पड़ते हैं क्योंकि उनका इलाज लंबा और ज़्यादा जटिल होता है.

 

बारिश, संघर्ष और देरी


मानसून के दौरान, बस्तर के कई गाँव बाहरी दुनिया से आंशिक रूप से कट जाते हैं क्योंकि नाले-नाले उफान पर होते हैं, कच्ची सड़कें चलने लायक नहीं रहतीं और पब्लिक ट्रांसपोर्ट ठप हो जाता है. कागज़ पर जो सफ़र छोटा लगता है, उसे पैदल तय करने में अक्सर कई घंटे लग जाते हैं या कई बार गाड़ी बदलनी पड़ती है. हेल्थ वर्कर बताते हैं कि मौसम की वजह से अलग-थलग पड़ने के कारण अक्सर अपॉइंटमेंट छूट जाते हैं, बीमारी का पता चलने में देरी होती है और इलाज में रुकावट आती है.


इन रुकावटों के गंभीर नतीजे होते हैं. टीबी (तपेदिक) के इलाज के लिए कई महीनों तक लगातार दवा लेनी पड़ती है. दवा की डोज़ छूटने या फ़ॉलो-अप में देरी होने से ड्रग रेजिस्टेंस (दवा का असर न होना) का ख़तरा बढ़ जाता है, जिससे मरीज़ों को लंबे समय तक, ज़्यादा ज़हरीली और कम असरदार दवाओं वाला इलाज करवाना पड़ता है. एक्सपर्ट्स यह भी बताते हैं कि दूरी की वजह से बीमारी का पता चलने में ही देरी हो जाती है. दूर-दराज़ के आदिवासी समुदायों में जागरूकता की कमी, पारंपरिक इलाज पर निर्भरता और आस-पास जाँच की सुविधाओं के अभाव के कारण, कई मरीज़ बीमारी के गंभीर हो जाने के बाद ही औपचारिक स्वास्थ्य व्यवस्था तक पहुँच पाते हैं.


कई सालों तक बस्तर का बड़ा हिस्सा नक्सल हिंसा से भी प्रभावित रहा, जिससे नियमित हेल्थ सर्वे, आउटरीच प्रोग्राम और बीमारी की निगरानी करना मुश्किल हो गया. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसकी वजह से कुछ सबसे दूर-दराज़ के आदिवासी समुदायों में टीबी के बोझ के बारे में सीमित जानकारी मिल पाई है, जिससे समय पर इलाज शुरू करना और भी मुश्किल हो जाता है.


टीबी को अक्सर ठीक होने वाली बीमारी बताया जाता है. लेकिन बस्तर में, इलाज का दारोमदार सिर्फ़ दवाओं पर नहीं होता. यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या मरीज़ जंगल पार कर सकता है, ट्रांसपोर्ट का खर्च उठा सकता है, एक दिन काम छोड़कर जा सकता है और बीमारी के गंभीर होने से पहले हेल्थ सेंटर तक पहुँच सकता है. जब तक लोगों से हेल्थ सेंटर तक आने की उम्मीद करने के बजाय हेल्थकेयर खुद लोगों तक नहीं पहुँचेगा, तब तक दूरी ही यह तय करती रहेगी कि किसे समय पर इलाज मिलेगा और किसे नहीं.

 

चिकित्सा सेवा तक पहुँच अब भी चुनौती


दंतेवाड़ा के टीबी के नोडल ऑफिसर डॉ. साकेत कुमार बताते हैं- "अक्सर, आदिवासी महिलाएँ बीमारी के लक्षण दिखने पर अपने परिवार को बताने से बचती हैं. कई महिलाएँ समाज में बदनामी, दूसरों के ताने या अपने परिवार पर बोझ बनने के डर से ऐसा करती हैं. लाखों महिलाओं के लिए, टीबी (TB) सिर्फ़ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक सामाजिक चुनौती भी है. हालाँकि टीबी किसी को भी हो सकती है, लेकिन सामाजिक दबाव और जेंडर के आधार पर भेदभाव के कारण महिलाएँ अक्सर अपने लक्षणों को छिपाती हैं और इलाज में देरी करती हैं, जिससे उनकी जान को ज़्यादा ख़तरा हो जाता है."


उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिलाएँ अपनी कड़ी मेहनत के लिए जानी जाती हैं. दूर-दराज़ के जंगली इलाकों में रहने के कारण, उन्हें अक्सर जब कभी कोई छोटी-मोटी बीमारियाँ हो जाती है तो इलाज के लिए वो पारंपरिक जड़ी-बूटियों पर निर्भर होती हैं. नतीजतन, वे टीबी के लगातार बने रहने वाले लक्षणों को भी यह सोचकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं कि वे गंभीर नहीं हैं.


कुमार कहते हैं- "जब इन दूर-दराज़ के समुदायों की महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी ज़्यादा गंभीर समस्याएँ होती हैं, तो परिवार वाले आम तौर पर उन्हें सबसे पहले पारंपरिक इलाज करने वालों के पास ले जाते हैं. इससे अक्सर सही जाँच और इलाज में देरी हो जाती है, और हेल्थकेयर सेंटर तक पहुँचने से पहले ही बीमारी और बिगड़ जाती है."


हालाँकि सरकारी दावा है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ गाँवों के पास हेल्थ कैंप लगाकर, लगातार आदिवासियों और बीमारी के बीच की दूरी को कम करने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ हद तक इससे मदद भी मिल रही है, लेकिन कई बार ग्रामीण सही हेल्थकेयर सेंटर तक नहीं पहुँच पाते हैं.


ज़ाहिर है, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के लिए यह दूरी, असल में उनकी जिंदगी और मौत की दूरी भी है, जिससे कम से कम अभी तो मुक्ति की कोई राह नज़र नहीं आती.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP