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मिर्गी के इलाज में ऐतिहासिक सफलता: चेमोजेनेटिक थेरेपी और 'मॉलिक्यूलर स्विच' से दौरे बंद

चीन के शोधकर्ताओं ने रिफ्रैक्टरी एपिलेप्सी के इलाज में 'चेमोजेनेटिक न्यूरोमॉड्यूलेशन' तकनीक का सफल पहला इंसानी ट्रायल किया है. एमआरआई और जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से दिमाग में 'मॉलिक्यूलर स्विच' लगाकर और क्लोज़ापीन दवा की मदद से मरीजों के दौरों में 92.6% तक की गिरावट दर्ज की गई है.

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07 नव. 2026, 12:10 AM 4 मिनट में पढ़ें 59

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नई दिल्ली । डेस्क: रिफ्रैक्टरी एपिलेप्सी यानी गंभीर मिर्गी से पीड़ित मरीजों के लिए उनका दिमाग एक ऐसे शहर की तरह होता है, जहां बिना किसी चेतावनी के कभी भी बिजली कड़क सकती है और अंधेरा छा सकता है. अनियंत्रित न्यूरल डिस्चार्ज के कारण मरीजों को दौरों, बेहोशी और सालों के खौफ का सामना करना पड़ता है. दुनिया भर में मिर्गी के करीब एक-तिहाई मरीज मौजूदा दवाओं से ठीक नहीं हो पाते, जबकि पारंपरिक क्रेनियोटॉमी सर्जरी में दिमाग को स्थायी नुकसान पहुंचने का जोखिम रहता है. इस चुनौती से निपटने के लिए चीन की एक न्यूरोसाइंस और क्लिनिकल सर्जरी टीम ने एक नया रास्ता चुना है.

दिमाग में स्थापित किया गया 'मॉलिक्यूलर स्विच'

बीमार दिमागी टिश्यू को काटने के बजाय शोधकर्ताओं ने जेनेटिक इंजीनियरिंग के जरिए अनियंत्रित न्यूरॉन्स के अंदर एक 'मॉलिक्यूलर स्विच' स्थापित किया है. इस तकनीक में मूल रूप से शिजोफ्रेनिया के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक छोटी सी गोली को इस स्विच की चाबी की तरह प्रयोग किया जाता है, जो दौरा शुरू होने के सटीक समय पर उसे रोक देती है. 'चेमोजेनेटिक न्यूरोमॉड्यूलेशन' का यह दुनिया का पहला इंसानी क्लिनिकल ट्रायल है.

इस शोध के शुरुआती नतीजे 'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन' (NEJM) में एक पत्र के रूप में प्रकाशित हुए हैं. कैपिटल मेडिकल यूनिवर्सिटी के जुआनवू अस्पताल के अध्यक्ष और चीन के नेशनल सेंटर फॉर न्यूरोलॉजिकल डिजीज के निदेशक झाओ गुओगुआंग ने बताया कि अध्ययन में एमआरआई-गाइडेड इंट्राहिप्पोकैम्पल GA002 वायरल वेक्टर डिलीवरी और कम खुराक वाली ओरल क्लोज़ापीन के जरिए इलाज की प्रारंभिक व्यवहार्यता और सुरक्षा के सबूत मिले हैं.

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इंसानी ट्रायल में ऐसे किया गया इलाज

इस ट्रायल में रिफ्रैक्टरी मेडियल टेम्पोरल लोब एपिलेप्सी और हिप्पोकैम्पल स्केलेरोसिस से पीड़ित 28 से 37 वर्ष के तीन पुरुष शामिल हुए, जो 10 से 25 वर्षों से इस बीमारी से जूझ रहे थे. एमआरआई मार्गदर्शन में सर्जन ने मरीजों के दिमाग के हिप्पोकैम्पस क्षेत्र में 0.5 से 1 मिलीलीटर GA002 का इंजेक्शन दिया. हिप्पोकैम्पस दिमाग का वह हिस्सा है जो नई यादें बनाने, स्थानिक जानकारी और भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होता है. बार-बार दौरे पड़ने से इसके न्यूरॉन्स क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिसे हिप्पोकैम्पल स्केलेरोसिस कहा जाता है.

दवा देते ही थम जाता है असामान्य डिस्चार्ज

शरीर के अंदर पहुंचते ही GA002 इंजेक्शन का वायरस क्षतिग्रस्त हिस्से के आसपास के न्यूरॉन्स में 'hM4D' नामक एक कृत्रिम रिसेप्टर तैयार करता है, जिसे DREADDs भी कहा जाता है. सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति स्थिर होने पर उन्हें क्लोज़ापीन दवा दी जाती है. क्लोज़ापीन इस कृत्रिम रिसेप्टर पर काम करके दिमाग के असामान्य इलेक्ट्रिकल डिस्चार्ज को रोक देती है, जिससे दौरा रुक जाता है. दिमाग का अपना सिग्नलिंग मॉलिक्यूल यानी एसिटाइलकोलीन इस कृत्रिम रिसेप्टर को सक्रिय नहीं कर सकता.

यह 'स्विच' सामान्य स्थिति में बंद रहता है. जब दौरा आने वाला होता है, तब दवा की एक छोटी सी खुराक इस बटन को दबाकर असामान्य डिस्चार्ज को बंद कर देती है.

दौरों की आवृत्ति में 92.6 प्रतिशत तक आई कमी

सर्जरी के दो महीने बाद किए गए फॉलो-अप में तीनों मरीजों में दौरों की औसत आवृत्ति में 92.6 प्रतिशत की कमी देखी गई. पहले मरीज के मासिक दौरे 4.5 से घटकर 0.5 रह गए, दूसरे के चार से शून्य हो गए, और तीसरे के 4.5 से घटकर 0.5 पर आ गए.

दीर्घकालिक फॉलो-अप में भी इसके फायदे जारी रहे. 12 महीने तक ट्रैक किए गए पहले मरीज और 8 महीने तक ट्रैक किए गए दूसरे मरीज को इलाज के दौरान दोबारा कोई दौरा नहीं पड़ा. तीसरे मरीज ने क्लोज़ापीन की खुराक अनियोजित रूप से रोक दी थी, जिससे उसे दो बार दौरे पड़े, लेकिन दवा फिर से शुरू करते ही दौरे तुरंत नियंत्रित हो गए. अध्ययन के दौरान सभी प्रतिकूल प्रभाव हल्के या मध्यम स्तर के ही दर्ज किए गए.

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