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क्या अमेरिकी चुनाव के बाद गहराएगा ईरान युद्ध?

मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स का कब्जा होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप घरेलू स्तर पर कमजोर पड़े हैं, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि ईरान युद्ध का जल्द अंत आसान नहीं है और यह संघर्ष लंबा खींच सकता है.

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07 नव. 2026, 12:05 AM 3 मिनट में पढ़ें 74

डोनाल्ड ट्रंप- राष्ट्रपति अमेरिका
डोनाल्ड ट्रंप- राष्ट्रपति अमेरिका

नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका में हाल ही में संपन्न हुए मध्यावधि चुनावों में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी को तगड़ा झटका लगा है. ईरान के साथ जारी युद्ध की पृष्ठभूमि में आए इन नतीजों ने डेमोक्रेटिक पार्टी को अमेरिकी कांग्रेस का पूर्ण नियंत्रण सौंप दिया है. टेक्सास और कंसास जैसे पारंपरिक रूप से मजबूत राज्यों में रिपब्लिकन पार्टी की हार को अमेरिकी जनता द्वारा युद्ध के प्रति अपनी नाखुशी के रूप में देखा जा रहा है. 

हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञों का तर्क है कि वाशिंगटन की सत्ता संरचना में आए इस बड़े बदलाव के बावजूद ईरान के साथ जारी इस सैन्य संघर्ष के जल्द समाप्त होने के आसार बहुत कम हैं. वाशिंगटन के पास अब किसी आसान समाधान का विकल्प उपलब्ध नहीं बचा है, जिससे यह युद्ध लंबा खींचने की ओर अग्रसर दिख रहा है.

राष्ट्रपति ट्रंप की स्वीकारोक्ति और अमेरिकी राजनीति में बदलता संतुलन

चुनाव में मिली करारी हार के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने माना है कि ईरान और इजराइल से जुड़ा यह संघर्ष रिपब्लिकन पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन का एक प्रमुख कारण रहा है. हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान के खिलाफ की गई कार्रवाई जरूरी थी और यह आगे भी जारी रहेगी. चुनाव के बाद उन्होंने ईरान को और अधिक तबाही की चेतावनी दी है, हालांकि हमलों को फिर से शुरू करने के अपने वादे पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है. 

दूसरी ओर, कांग्रेस में नियंत्रण गंवाने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप की विधायी और राजनीतिक स्थिति काफी कमजोर हो गई है. जानकारों का कहना है कि अगले दो महीनों का संक्रमण काल राष्ट्रपति के लिए एक अवसर की तरह है, लेकिन उनकी प्रशासनिक टीम में आत्म-संरक्षण की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है और इजराइल को लेकर अमेरिकी राजनीति में द्विपक्षीय सहमति का पुराना दौर अब बिखर चुका है.

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वाशिंगटन के पास बचे केवल कठिन विकल्प

निंग्जिया यूनिवर्सिटी के चाइना-अरब रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक न्यू शिनचुन के अनुसार, चुनाव परिणामों ने वाशिंगटन की मूल दुविधा को हल नहीं किया है. अमेरिका के सामने इस समय तीन ही रास्ते मौजूद हैं: कूटनीतिक समझौता, पूर्ण सैन्य हमला या संघर्ष को लंबा खींचना. 

पहली दो राहें बंद नजर आती हैं. मध्यावधि नतीजों को अपनी जीत मानकर बैठा ईरान बातचीत के मेज पर झुकने को तैयार नहीं है, और अमेरिका हार स्वीकार करने जैसी शर्तों पर समझौता नहीं करना चाहता. दूसरी तरफ, शुरुआती चालीस दिनों के अभियान की विफलता और संसद में विपक्षी दबदबे के कारण नया बड़ा सैन्य हमला करना लगभग असंभव है. ऐसे में कूटनीति और युद्ध दोनों के रास्ते बंद होने पर केवल संघर्ष को खींचने का विकल्प ही बचता है.

ईरान की शर्तें, होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट और भावी दिशा

तेहरान ने अमेरिकी चुनाव परिणामों को युद्ध विरोधी जनादेश करार दिया है और स्पष्ट चेतावनी दी है कि हमला होने पर वह अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाएगा. ईरान ने सैनैक्शन हटाने और अपनी जब्त संपत्तियों को बहाल करने की शर्त पर दो दिनों के भीतर होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने की पेशकश की है, जिसे स्वीकार करना वाशिंगटन के लिए बेहद जटिल है. 

सिंगापुर और चीनी थिंक-टैंक विशेषज्ञों का कहना है कि यद्यपि यह स्थिति एक 'संरचित गतिरोध' में बदल सकती है, लेकिन यह अफगानिस्तान की तरह दशकों तक चलने वाला युद्ध नहीं बनेगा. होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने का क्षेत्रीय और वैश्विक असर इतना गंभीर है कि इसे अनदेखा करना किसी भी पक्ष के लिए संभव नहीं होगा.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP