इलाहाबाद HC: 'सिख टिप्पणी' मामले में राहुल गांधी पर नहीं होगी FIR, कहा- सवाल उठाना सांसद का कर्तव्य
अमेरिका में दिए गए बयान पर राहुल गांधी के खिलाफ FIR दर्ज कराने की याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट से खारिज हो गई है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी वर्ग की चिंता उठाना सांसद का मुख्य कार्य है और यह भाषण Article 19 के तहत सुरक्षित है.
प्रयागराज । डेस्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है. यह याचिका उनके द्वारा भारतीय सिख समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर की गई टिप्पणी से जुड़ी थी. न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि के रूप में राहुल गांधी को समाज के किसी भी वर्ग या अल्पसंख्यक समुदाय की चिंताओं को उठाने का पूरा अधिकार है.
कोर्ट के अनुसार, केवल किसी समुदाय की चिंताओं को व्यक्त करने से कोई अपराध घटित नहीं होता और उनका यह भाषण संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्राप्त वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार द्वारा संरक्षित है.
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना कि एक जनप्रतिनिधि द्वारा विदेशी धरती पर इस तरह के मुद्दे उठाना कुछ लोगों के लिए अनुचित या संसदीय लोकतंत्र की पुरानी परंपराओं से विचलन का विषय हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में कोई अपराध नहीं बन जाता. यदि किसी जनप्रतिनिधि का बयान गलत या निराधार भी पाया जाता है, तो उसका सही तरीका संसदीय बहस या खुले सार्वजनिक विमर्श के माध्यम से उसकी जांच करना है, ताकि विचारों की स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा से सच सामने आ सके.
पीठ ने जोर देकर कहा कि जनहित के मुद्दों को सार्वजनिक मंचों या विधायिका में उठाना जनप्रतिनिधि का कोई वैकल्पिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि उनका मूल कर्तव्य है, जो सरकार को सतर्क रखकर सुशासन और जवाबदेही को बनाए रखता है.
यह पूरा विवाद राहुल गांधी द्वारा 9 सितंबर 2024 को अमेरिका के एक कार्यक्रम में सिख श्रोता को संबोधित करते हुए दिए गए बयान से शुरू हुआ था. उन्होंने कहा था कि यह लड़ाई इस बात की है कि क्या एक सिख को भारत में पगड़ी, कड़ा पहनने और गुरुद्वारे जाने की अनुमति होगी या नहीं.
इस बयान के खिलाफ शिकायतकर्ता नागेश्वर मिश्र ने वाराणसी के मजिस्ट्रेट कोर्ट का रुख कर FIR दर्ज करने की मांग की थी. हालांकि, 17 अक्टूबर 2025 को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) नीरज कुमार त्रिपाठी ने इस शिकायत को खारिज कर दिया था. इसके बाद सत्र अदालत ने भी 9 जुलाई को पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा था.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मौलिक आधार है, और अदालतों का कर्तव्य है कि वे इस अधिकार को अक्षुण्ण रखें.
कोर्ट ने पाया कि राहुल गांधी के बयान से हिंसा भड़कने या लोक व्यवस्था बिगड़ने का कोई प्रमाण नहीं है. यदि कोई तीसरा पक्ष इस भाषण का गलत अर्थ निकालता है या अपने स्वार्थ के लिए इसका इस्तेमाल करता है, तो उसकी जिम्मेदारी उस तीसरे पक्ष की होगी. चूंकि भाषण से देश की संप्रभुता या अखंडता को खतरा पहुंचाने या अलगाववाद को बढ़ावा देने जैसा कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, इसलिए कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया.