बांग्लादेश लौटने पर अड़ीं शेख हसीना: 'विदेश में रहने के बजाय अपनी धरती पर मरना पसंद करूंगी'
"यदि मृत्यु ही मेरी नियति है, तो मैं अपने देश की मिट्टी में मरना पसंद करूंगी."— फांसी की सजा और गिरफ्तारी की आशंका के बीच पूर्व पीएम शेख हसीना ने अगले महीने भारत से बांग्लादेश लौटने का बड़ा फैसला किया है.
नई दिल्ली । डेस्क: 2024 में जनक्रांति के बाद सत्ता से बेदखल होकर भारत में शरण लेने वाली बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अगले महीने अपने देश वापस लौटने का संकल्प व्यक्त किया है. एक विशेष अदालत द्वारा अपने खिलाफ सुनाए गए मृत्युदंड के फैसले और स्वदेश पहुंचते ही गिरफ्तारी की प्रबल आशंकाओं के बावजूद वह अपने फैसले पर कायम हैं.
बांग्लादेश द्वारा बार-बार प्रत्यर्पण की मांग के बाद भी भारत ने उन्हें सौंपने से इनकार कर दिया है. उन्होंने अपने एक बयान में स्पष्ट कहा है कि यदि मौत ही उनकी नियति है, तो वह किसी दूसरे देश में रहने के बजाय बांग्लादेश की मिट्टी और अपने लोगों के बीच मरना पसंद करेंगी.
गौरतलब है कि 2025 में एक बांग्लादेशी विशेष न्यायाधिकरण ने शेख हसीना को उनके शासनकाल के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुए खूनी क्रैकडाउन के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए मानवता के खिलाफ अपराधों के तहत मौत की सजा सुनाई थी. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक इस कार्रवाई में लगभग 1,400 लोगों की जान गई थी, जबकि कई हजार घायल हुए थे.
हसीना ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए मुकदमे की वैधता को चुनौती दी है. वर्ष 2009 से 2024 तक प्रधानमंत्री रहीं हसीना ने सुरक्षा कारणों से यह तो उजागर नहीं किया कि वह भारत से वापस कैसे जाएंगी, लेकिन वह वहां जेल, यातना या जान के खतरे जैसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं.
हसीना के तख्तापलट के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में 18 महीने तक अंतरिम सरकार चली, जिसके बाद फरवरी में हुए चुनावों में खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान ने प्रचंड जीत दर्ज की. इन चुनावों से शेख हसीना की आवामी लीग पार्टी को बाहर रखा गया था.
हसीना ने आरोप लगाया है कि अगस्त 2024 के बाद से उनकी पार्टी के कम से कम 20,000 सदस्यों की हत्या कर दी गई है और हजारों नेताओं को जेल या देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है.
उन्होंने यह भी कहा कि देश में चरमपंथी तत्वों का प्रभाव बढ़ रहा है. अपनी सुरक्षा के लिए किसी विदेशी शक्ति से मदद मांगने की बात को नकारते हुए उन्होंने साफ किया कि उन्हें अपने देश लौटने के लिए किसी बाहरी देश के आशीर्वाद की जरूरत नहीं है.