HC: बीमार माता-पिता से अलग रहने का दबाव बनाना 'मानसिक क्रूरता', पति को मिला तलाक
बिलासपुर । संवाददाता: वैवाहिक विवाद से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि शादी के बाद नया परिवार बनने के बावजूद कोई भी व्यक्ति अपने वृद्ध और बीमार माता-पिता के प्रति नैतिक और कानूनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो जाता. न्यायमूर्ति एनके चंद्रवंशी की एकल पीठ ने कहा कि किसी बेटे पर उसकी बीमार मां को बेसहारा छोड़कर अलग रहने का दबाव डालना और झूठे आपराधिक मामलों में उलझाना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है.
इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला निरस्त करते हुए पीड़ित पति की तलाक याचिका को मंजूरी दे दी.
यह मामला उत्तर प्रदेश के इटावा निवासी विवेक अग्रवाल और पेंड्रा रोड की एक महिला से जुड़ा है, जिनका विवाह दिसंबर 2014 में हुआ था. पति का आरोप था कि शादी के बाद से ही पत्नी छोटी-छोटी बातों पर कलह करती थी और उसकी बुजुर्ग व अस्वस्थ मां को छोड़कर अलग बड़े मकान में रहने की जिद पर अड़ी थी.
जब पति ने अपनी मां को अकेले छोड़ने से मना कर दिया, तो विवाद और गहरा गया. अगस्त 2019 में पत्नी अपने छोटे बेटे को इटावा में ही छोड़कर बिना बताए मायके चली गई, जिसके बाद से दोनों अलग रह रहे थे.
लगातार बढ़ते विवादों और ससुराल न लौटने पर पति ने 2022 में पेंड्रा रोड स्थित निचली अदालत में क्रूरता के आधार पर तलाक की अर्जी दाखिल की थी. हालांकि, 18 फरवरी 2025 को निचली अदालत ने आरोपों को साबित न मानते हुए याचिका खारिज कर दी थी, जिसे बाद में पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी.
मामले की समीक्षा करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि 2019 से अलग रह रहे दंपत्ति के बीच लगातार मुकदमों के कारण विश्वास पूरी तरह खत्म हो चुका है. अदालत ने कहा कि किसी भी बेटे के लिए अपनी अस्वस्थ मां का साथ देने का फैसला पूरी तरह स्वाभाविक है, इसलिए निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए विवाह विच्छेद की अनुमति दी जाती है.