HC: ED द्वारा जब्त संपत्तियों के बदले FD स्वीकार करने की याचिका खारिज
बिलासपुर । संवाददाता: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई का सामना कर रहे याचिकाकर्ताओं की छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अचल संपत्तियों के बदले सावधि जमा (एफडी) स्वीकार करने की मांग को सिरे से नकार दिया है. न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने इस मामले पर स्पष्ट किया कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कुर्क की गई संपत्तियों को एफडी जैसी तरल संपत्ति से बदलने का कोई सामान्य कानूनी अधिकार नहीं है.
अदालत के अनुसार, केवल 2013 के पीएमएलए नियमों के नियम 5(5) के अंतर्गत सीमित और विवेकाधीन परिस्थितियों (जैसे संयुक्त स्वामित्व) में ही ऐसा संभव है, जिसे अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता.
मामला जिला खनिज कोष (डीएमएफ) में हुई अनियमितताओं और धन की हेराफेरी से जुड़ा है. ईडी ने इस कथित अपराध से अर्जित आय के समतुल्य मूल्य के आधार पर 9 दिसंबर 2024 को छह अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया था, जिसकी पुष्टि अगले वर्ष 23 मई को निर्णायक प्राधिकरण ने भी कर दी थी.
इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं, ऋषभ सोनी और उनकी पत्नी कोमल सोनी ने अपीलीय न्यायाधिकरण में चुनौती दी थी. न्यायाधिकरण में सुनवाई लंबित रहने के दौरान ही उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर मांग की थी कि जब्त संपत्तियों के बदले उनकी 4.36 करोड़ रुपए की एफडी स्वीकार कर ली जाए, क्योंकि संपत्तियां सीधे अपराध की आय न होकर उसके समतुल्य मूल्य की हैं.
सुनवाई के दौरान ईडी ने याचिका का कड़ा विरोध किया. जांच एजेंसी ने अदालत के सामने सबूत पेश करते हुए बताया कि मामला केवल कागजी हेराफेरी का नहीं है, बल्कि आवास प्रविष्टियों और कमीशन भुगतान के जरिए डीएमएफ फंड में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई है.
ईडी ने यह तर्क भी दिया कि पीएमएलए कानून में इस तरह से संपत्तियों के प्रतिस्थापन की कोई व्यवस्था नहीं है. साथ ही, याचिकाकर्ताओं को सीधे रिट याचिका दायर करने के बजाय कानून की धारा 42 के तहत वैधानिक अपील के मार्ग का पालन करना चाहिए था.
उच्च न्यायालय ने ईडी के तर्कों और पीएमएलए के कानूनी प्रावधानों को सही मानते हुए याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया. अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 226 का हवाला देते हुए कहा कि केवल समान मूल्य की एफडी की पेशकश कर देने मात्र से संपत्ति छोड़ने का कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं हो जाता.
कोर्ट के इस सख्त रुख से साफ हो गया है कि आर्थिक अपराधों और पीएमएलए के मामलों में जब तक कोई विशेष वैधानिक छूट न हो, तब तक जब्त संपत्तियों को बदलना संभव नहीं होगा.