जी-7 शिखर सम्मेलन पर ग्लोबल टाइम्स का संपादकीय
बीजिंग । डेस्क: ग्रुप ऑफ सेवन (G7) का वार्षिक शिखर सम्मेलन 15 से 17 जून तक फ्रांसीसी आल्प्स की तलहटी में बसे खूबसूरत शहर एवियन-ले-बैंक्स में आयोजित होने जा रहा है. हालांकि, इस बैठक के औपचारिक आगाज से पहले ही यह वैश्विक मंच विवादों और तीखी आलोचनाओं के घेरे में आ गया है. इस बार का सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिमी ब्लॉक के भीतर गहरे मतभेद और उसका वैश्विक पतन साफ तौर पर दिखाई दे रहा है.
खुद इन अमीर देशों के नागरिक अब जी-7 को एक 'पाखंडी', 'स्वार्थी' और 'दुनिया से कटे हुए' समृद्ध देशों के क्लब के रूप में देखने लगे हैं. तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था और बहुध्रुवीयता के इस दौर में, जी-7 अपनी प्रासंगिकता खोता हुआ नजर आ रहा है.
मौजूदा समय में सभी जी-7 देश सुस्त आर्थिक विकास, बढ़ते कर्ज के बोझ, घटती औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता, गहरे सामाजिक विभाजन और बूढ़ी होती आबादी जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं. इस 'जी-7 बीमारी' के इलाज के लिए बड़े और कड़े कदमों की जरूरत है, लेकिन सदस्य देशों के बीच आपसी खींचतान इस कदर बढ़ चुकी है कि कोई आम सहमति बनना नामुमकिन लग रहा है.
विशेष रूप से यूरोपीय देशों के बीच अमेरिका को लेकर अविश्वास ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. यही वजह है कि विशेषज्ञ इस साल भी किसी संयुक्त घोषणापत्र के जारी न होने की आशंका जता रहे हैं, जिससे यह सम्मेलन इतिहास का सबसे बेअसर और कमजोर साझा मंच साबित हो सकता है.
अपनी गिरती ताकत और बिखरती एकजुटता पर आत्ममंथन करने के बजाय, जी-7 देश अब अपनी नाकामियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. यूरोपीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा केवल 'चीन को दोष देना' रह गया है.
बैठक में कथित व्यापार असंतुलन, अतिरिक्त उत्पादन क्षमता, महत्वपूर्ण खनिज गठबंधन और 'डी-रिस्किंग' जैसे मुद्दों को उठाकर चीन को घेरने की रणनीति बनाई गई है. लेकिन असलियत यह है कि आज औद्योगिक श्रृंखला के पुनर्गठन, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक वित्तीय स्थिरता और जलवायु परिवर्तन जैसी बड़ी चुनौतियों का समाधान चीन और 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की भागीदारी के बिना संभव ही नहीं है.
21वीं सदी की शुरुआत से ही वैश्विक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है. चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में वैश्विक विकास का इंजन बना हुआ है, जबकि भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसी उभरती शक्तियां तेजी से आगे बढ़ी हैं. ब्रिक्स (BRICS) देशों के इस सामूहिक उदय ने पश्चिमी देशों के पुराने दबदबे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है.
आज ग्लोबल साउथ के देश अपनी विशाल आबादी, बड़े बाजारों और मजबूत विकास क्षमता के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ बन चुके हैं. ऐसे में, दुनिया की 10 प्रतिशत से भी कम आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला और वैश्विक जीडीपी में लगातार सिकुड़ती हिस्सेदारी वाला यह समूह खुद को 'दुनिया का नेता' समझने का भ्रम पाले बैठा है.
अपनी घरेलू समस्याओं और जनता के आक्रोश से ध्यान भटकाने के लिए जी-7 ने चीन विरोध को एक हथियार बना लिया है. यह स्थिति वैसी ही है जैसे कोई खुद बीमार हो और दवा दूसरों के लिए लिख रहा हो.
आज की वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए चीन ने एक समान, व्यवस्थित बहुध्रुवीय दुनिया और समावेशी आर्थिक वैश्वीकरण का विकल्प पेश किया है. अब समय आ गया है कि जी-7 देश अपने 'लीडर के भ्रम' से बाहर निकलें और शून्य-योग (जीरो-सम) की राजनीति छोड़कर खुलेपन, समावेशी सोच और बहुपक्षीय सहयोग का रास्ता अपनाएं. हालांकि, जो देश जानबूझकर सोने का नाटक कर रहा हो, उसे जगाना बेहद मुश्किल काम है.