हिटलर से ओबामा तक: स्विस बैंकों का गोपनीय किला
नई दिल्ली । डेस्क: दुनिया के धनकुबेर शिल्पपतियों से लेकर शक्तिशाली नेताओं तक, सभी स्विस बैंकों की गोपनीयता की दीवार के पीछे अपने काले धन और सोने को छिपाने का रुझान रखते हैं. इसका कारण है कि वे अपने देश के बैंकों पर भरोसा नहीं कर पाते. स्विट्जरलैंड के ये बैंक ग्राहकों की हर जानकारी को कब्र की तरह गुप्त रखते हैं, जो किसी भी सैन्य गठबंधन या राजनीतिक उथल-पुथल से दूर इस तटस्थ यूरोपीय देश की विशेषता है.
17वीं शताब्दी में यूरोप के अभिजातों की संपत्ति की रक्षा के उद्देश्य से शुरू हुई यह बैंकिंग प्रथा 1713 में जिनेवा की ग्रेट काउंसिल द्वारा पारित गोपनीयता कानून से मजबूत हुई, जब कैथोलिक फ्रांसीसी राजा प्रोटेस्टेंट फ्रांस के बैंकों से दूर भागे. 1780 में सभी जमा संपत्तियों को बीमा कवर मिला, जिससे आकर्षण बढ़ा. 1815 के वाटरलू युद्ध में नेपोलियन की हार के बाद स्विट्जरलैंड ने खुद को तटस्थ घोषित कर लिया, और 1848 के छोटे गृहयुद्ध के बाद बनी फेडरेशन ने लोकतांत्रिक स्थिरता प्रदान की, जिसने सख्त गोपनीयता कानूनों को आसान बना दिया.
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) की अनिश्चितताओं ने फ्रांस-जर्मनी के अभिजातों को स्विस बैंकों की ओर धकेला, जहां युद्ध करों से बचने वालों की भीड़भाड़ लग गई. 1934 में कानून को और कठोर बनाया गया, जिसमें गोपनीयता भंग पर सिविल के बजाय आपराधिक मुकदमा तय हुआ, जिससे यूरोपीय विश्वास कई गुना बढ़ा.
1933 में हिटलर की सत्ता में आगमन के साथ जर्मनी में यहूदियों का नरसंहार शुरू हुआ, तो उनके व्यापारी स्विस बैंकों में धन छिपाने लगे. यहां तक कि हिटलर ने खुद यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड (यूबीएस) में 110 करोड़ रीच्समार्क जमा कराए, और उनके नाजी सहयोगी भी पीछे न रहे. हिटलर ने 1940 में स्विट्जरलैंड पर हमले की योजना बनाई, लेकिन अपने ही जमा धन के डर से जनरलों के परामर्श पर इसे रद्द कर दिया.
द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) के बाद यहूदियों की संपत्ति वापसी के प्रयासों में अमेरिका ने 90 के दशक में हिटलर के धन की मांग की, लेकिन स्विस बैंकों ने इसे जर्मनी को लौटाकर ग्राहकों का भरोसा कायम रखा.
2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने फिर हलचल मचाई, जब दिसंबर में संसद ने गोपनीयता भंग पर छह महीने की सजा को पांच साल जेल में बदल दिया, लेकिन बैंक अभी भी चुप्पी साधे रहे. सबसे बड़ा झटका 2001 में यूबीएस जॉइन करने वाले अमेरिकी ब्रैडली बर्केनफील्ड ने दिया, जिन्होंने 2005 में इस्तीफे के बाद यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट को 19,000 अमेरिकियों के 1,800-2,000 करोड़ डॉलर के काले धन का खुलासा किया, जिसके लिए बैंक पर 78 करोड़ डॉलर का जुर्माना लगा.
बर्केनफील्ड को 2009 में टैक्स चोरी के लिए जेल हुई, लेकिन 2012 में रिहा होने पर 10.4 करोड़ डॉलर इनाम मिला, और यह घटना 'बर्केनफील्ड डिस्क्लोजर' के नाम से मशहूर हो गई. 2009 में यूएस ने यूबीएस के खिलाफ मुकदमा ठोक दिया, और तत्कालीन विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की जिनेवा यात्रा में 52,000 अमेरिकी खातों की मांग की, लेकिन गोपनीयता कानून के दबाव में सिर्फ 4,500 का डेटा सौंपा गया.
पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने काले धन रोकने के लिए 'फॉरेन अकाउंट्स टैक्स कंप्लायंस एक्ट' (FATCA) पास कराया, और स्विट्जरलैंड को धमकी दी कि अमेरिकी नागरिकों के डेटा न दिए तो व्यापारिक रिश्ते तोड़ देंगे, जिससे जिनेवा को गोपनीयता में थोड़ी ढील देनी पड़ी.
2015 में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और ब्रिटेन के साथ 'रूबिक समझौते' में हस्ताक्षर हुए, जहां कर चुकाने पर स्विस खातों की गोपनीयता बरकरार रखी गई, जो बैंकों के फायदे में साबित हुआ.
आज भी रूसी ओलिगार्क, चीनी कम्युनिस्ट नेताओं और अमेरिकी अरबपतियों का विशाल धन स्विस वाल्टों में जमा है, और वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता से इनकी संपत्ति और बढ़ रही है. यूरोप में अफवाहें हैं कि इन बैंकों ने विशेष बंकर्स या आल्प्स की दुर्गम गुफाओं में वॉल्ट बनाए हैं, लेकिन गोपनीयता कानूनों के कारण सच्चाई आज भी रहस्य बनी हुई है. (AI Generated symbolic photo)