भारतीय रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी पर विदेशी अखबार
नई दिल्ली । डेस्क: हांगकांग के प्रमुख समाचार पत्र 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' (SCMP) में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण और निर्यात बाजार में बड़ी पहचान बनाने के लिए अभी भी देश की निजी कंपनियों को अपनी तकनीकी क्षमताओं को काफी मजबूत करना होगा. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के कुल रिकॉर्ड 18.7 अरब डॉलर के रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत यानी 4.4 अरब डॉलर रही है.
यह आंकड़े रक्षा मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी किए गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि पारंपरिक रूप से सरकारी उपक्रमों के दबदबे वाले इस क्षेत्र में अब धीरे-धीरे एक बड़ा बदलाव आ रहा है. निजी कंपनियां अब ड्रोन, निगरानी प्रणाली, गोला-बारूद और कलपुर्जों के निर्माण में बढ़-चढ़कर योगदान दे रही हैं.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस रिकॉर्ड उत्पादन की सराहना करते हुए इसे निरंतर नीतिगत समर्थन, नई पहलों और निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी का परिणाम बताया है. हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये आंकड़े पूरी कहानी बयां नहीं करते.
नई दिल्ली स्थित मनोहर पर्रीकर रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान के अनुसंधान विश्लेषक राहुल वानखेड़े का कहना है कि निजी कंपनियां फिलहाल सरकारी निर्माताओं को विस्थापित करने के बजाय केवल उनके पूरक के रूप में काम कर रही हैं. भारतीय सशस्त्र बलों को बुनियादी उपकरणों से लेकर एयरो-इंजन, उन्नत सेंसर, मिसाइल, विमान और पनडुब्बियों जैसे अत्यधिक जटिल प्रणालियों की आवश्यकता होती है, और इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारत आज भी सार्वजनिक क्षेत्र, डीआरडीओ या विदेशी तकनीकी सहयोग पर निर्भर है.
क्षमता के अंतर को पाटने की चुनौतियां:
देश के रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र में इस समय 500 से अधिक लाइसेंस प्राप्त रक्षा कंपनियां और 16,000 सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) सक्रिय हैं, जबकि 134 कंपनियां विकास भागीदार के रूप में डीआरडीओ के साथ पंजीकृत हैं. इस बड़े ढांचे के बावजूद निजी कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने राजस्व का कम से कम 5 प्रतिशत अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश करना होगा.
विशेषज्ञों का सुझाव है कि घरेलू और निर्यात मांग को पूरा करने के लिए एक ऐसा ढांचा तैयार किया जाना चाहिए जो निजी फर्मों को सार्वजनिक क्षेत्र के निर्माताओं, डीआरडीओ और स्टार्टअप्स के साथ जोड़े. हालांकि, रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 तक निजी रक्षा कंपनियों के राजस्व में सालाना 15 से 16 प्रतिशत की वृद्धि होगी, जो सरकार के 50 प्रतिशत निजी भागीदारी के अंतिम लक्ष्य की ओर एक सकारात्मक कदम है.
मुख्यधारा में निजी क्षेत्र की दस्तक और नवाचार:
यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया के शोधकर्ता गौरव कुमार के मुताबिक, रक्षा उत्पादन में 24 फीसदी की हिस्सेदारी कोई मामूली आंकड़ा नहीं है. यह इस बात का संकेत है कि निजी कंपनियां अब भारतीय रक्षा तंत्र के हाशिये से निकलकर उसके मुख्य केंद्र में आ चुकी हैं.
विशेष रूप से ड्रोन, स्वायत्त प्रणाली और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में, जिनकी सेना को भविष्य में सबसे ज्यादा जरूरत होगी, निजी क्षेत्र सरकारी कंपनियों की तुलना में अधिक तेजी से नवाचार करने की क्षमता रखता है.
भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 80 से अधिक देशों को 4.04 अरब डॉलर के रक्षा उत्पादों का निर्यात किया है और सरकार का लक्ष्य 2029 तक घरेलू उत्पादन को 31.6 अरब डॉलर तक पहुंचाना है, जिससे दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातकों में शुमार भारत की इस छवि को बदला जा सके.
वैश्विक संकटों के बीच आत्मनिर्भरता की अनिवार्यता:
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के रणनीतिक अध्ययन के उप निदेशक विवेक मिश्रा ने रेखांकित किया कि हाल के वैश्विक झटकों ने भारत के आत्मनिर्भरता अभियान को और तेज कर दिया है. कोविड-19 महामारी ने जहां आपूर्ति श्रृंखलाओं की संवेदनशीलता को उजागर किया, वहीं यूरोप और मध्य पूर्व के संकटों ने यह दिखा दिया कि युद्ध के समय मुनिशन्स का स्टॉक कितनी तेजी से खत्म होता है और समुद्री व्यापारिक मार्ग कैसे बाधित हो सकते हैं.
चीन के विपरीत, जहां सरकार राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में रक्षा क्षेत्र में सीधे भारी निवेश करती है, भारत को अन्य बजटीय मांगों को भी संतुलित करना होता है, इसलिए यहां केवल सरकारी खर्च के भरोसे नहीं बैठा जा सकता.
विदेशी निर्भरता की सबसे बड़ी बाधा:
भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा का मानना है कि रक्षा नवाचार और दोहरे उपयोग वाली तकनीकों के विकास में दुनिया भर में निजी क्षेत्र का योगदान सबसे महत्वपूर्ण रहा है. भारतीय निजी कंपनियों के पास फिलहाल बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता की कमी है, जिसे विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय साझेदारों को तकनीक हस्तांतरित करके सुधारा जा सकता है.
इसके विपरीत, कुछ विश्लेषक विदेशी निर्भरता को इस क्षेत्र की सबसे जिद्दी बाधा मानते हैं. भारत आज भी उन्नत एयरो-इंजन, प्रणोदन प्रौद्योगिकियों और उच्च-स्तरीय सेंसर के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है, जो सार्वजनिक और निजी दोनों ही क्षेत्रों को प्रभावित करता है और यह पूरी भारतीय रक्षा-औद्योगिक प्रणाली की एक साझा चुनौती बनी हुई है.