हाथियों की लीद से उगेगी उनकी पसंदीदा खुराक
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग ने एक बेहद अनोखा और वैज्ञानिक तरीका अपनाया है. सालों तक हाथियों के पीछे भागकर ग्रामीणों को सतर्क करने वाले वन्यकर्मी अब जंगलों के भीतर ही ऐसा माहौल तैयार कर रहे हैं, जिससे हाथी आबादी वाले इलाकों का रुख न करें. इसके लिए हाथियों की लीद से प्राकृतिक रूप से उगने वाले पौधों का सहारा लिया जा रहा है.
इस अनूठी मुहिम की शुरुआत छत्तीसगढ़ के उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) से हुई है. दरअसल, जंगलों में हाथियों की ट्रैकिंग करने वाले फ्रंटलाइन स्टाफ ने देखा कि हाथियों की ताजी लीद से कई मजबूत और स्वस्थ पौधे निकल रहे हैं.
वैज्ञानिक रूप से हाथियों का पाचन तंत्र ऐसा होता है कि वे जो फल और वनस्पतियां खाते हैं, उनके बीज लीद के साथ बाहर आते समय प्राकृतिक रूप से अंकुरित होने के लिए तैयार हो जाते हैं. वन विभाग ने इन पौधों को नष्ट होने से बचाने के लिए इन्हें सुरक्षित रूप से ट्रांसप्लांट करना शुरू कर दिया है ताकि हाथियों के लिए जंगल के भीतर ही भोजन के बड़े क्षेत्र तैयार किए जा सकें.
अधिकारियों के मुताबिक, यह कोई पारंपरिक वृक्षारोपण अभियान नहीं है. वन विभाग ने इसके लिए बकायदा 'सीजी एलीफेंट ट्रैकिंग एंड अलर्ट ऐप' के डेटा और सालों के जमीनी अनुभवों की मदद ली है. इस डेटा से यह साफ हुआ कि हाथी वास्तव में किस क्षेत्र में क्या खाना पसंद करते हैं.
उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप निदेशक वरुण जैन ने बताया कि इस कार्यक्रम से एक बड़ी बात सामने आई है कि हाथी महुआ के अलावा तेंदू, बांस, साल और अन्य स्थानीय वन्य प्रजातियों को भी काफी चाव से खाते हैं, जो कि आम धारणा से बिल्कुल अलग है.
इस पहल का मुख्य उद्देश्य जंगलों के भीतर ही हाथियों की पसंदीदा खुराक को प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराना है. वन विभाग को उम्मीद है कि जब हाथियों को उनके प्राकृतिक आवास में ही पर्याप्त भोजन मिल जाएगा, तो वे फसलों और गांवों की ओर नहीं भटकेंगे, जिससे मध्य भारत की इस बड़ी संरक्षण चुनौती और मानव-हाथी टकराव को स्थायी रूप से कम किया जा सकेगा.