मृत्युदंड केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम' मामलों में ही- छत्तीसगढ़ HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि मृत्युदंड केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम' मामलों में ही दिया जाना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने बेमेतरा की 25 वर्षीय महिला कर्मचारी के अपहरण, बलात्कार और हत्या के दोषी शंकर निषाद की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है.
हालांकि, अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि दोषी को अपनी स्वाभाविक मृत्यु तक जेल में रहना होगा और उसे किसी भी तरह की समय-पूर्व रिहाई या छूट का लाभ नहीं मिलेगा.
यह मामला 14 अगस्त 2022 का है, जब बेमेतरा पारिवारिक न्यायालय में कार्यरत पीड़िता रहस्यमय तरीके से लापता हो गई थी. जांच के बाद उसका शव पलगाड़ा घाट के घने जंगलों से बरामद हुआ था.
निचली अदालत ने दिसंबर 2025 में इस अपराध को अत्यंत क्रूर मानते हुए आरोपी को फांसी की सजा सुनाई थी. मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि यद्यपि अपराध जघन्य और सामाजिक रूप से वीभत्स है, लेकिन यह 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की उस कठोर कसौटी पर खरा नहीं उतरता जहाँ आजीवन कारावास का विकल्प पूरी तरह समाप्त मान लिया जाए.
अदालत ने अपने विश्लेषण में कहा कि निचली अदालत यह साबित करने में विफल रही कि आरोपी समाज के लिए निरंतर खतरा है या उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है.
बचाव पक्ष ने डीएनए रिपोर्ट की अनुपस्थिति और तकनीकी साक्ष्यों पर सवाल उठाए थे, लेकिन हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDRs) को पुख्ता सबूत मानते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखा. अंततः, सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए खंडपीठ ने फांसी की सजा को 'ताउम्र कैद' में तब्दील कर न्याय के संतुलन को बनाए रखने का निर्णय सुनाया.