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कॉरपोरेट-कर्मचारी विवाद और 1978 के फैसले पर जस्टिस नागरत्ना की असहमति

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23 अग. 2026, 05:47 AM 2 मिनट में पढ़ें 2

 जस्टिस नागरत्ना
जस्टिस नागरत्ना

नई दिल्ली । डेस्क: उद्योग की परिभाषा और कॉरपोरेट घरानों के मुकाबले कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ में एक महत्वपूर्ण असहमति सामने आई है. मामले में नौ जजों की पीठ के बहुमत के फैसले से अलग रुख अपनाते हुए जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने 147 पन्नों के अपने फैसले में आशंका जताई है कि 1978 के ऐतिहासिक फैसले को पूरी तरह खारिज करने से निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट कंपनियों को श्रमिकों पर हावी होने और एकतरफा मोलभाव करने की असीमित छूट मिल सकती है.


जस्टिस नागरत्ना का मानना है कि नए औद्योगिक संबंध संहिता 2020 (IRC) के तहत जब भविष्य में श्रम विवाद अदालत पहुंचेंगे, तब 'इंडस्ट्री' (उद्योग) की व्यापक परिभाषा को हटाना कर्मचारियों के हितों के खिलाफ जा सकता है. 

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उन्होंने 1978 के ऐतिहासिक 'बेंगलोर वाटर सप्लाई' मामले के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि इसने लगभग आधी सदी तक उदारीकरण और निजीकरण के दौर में श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा में एक मजबूत ढाल का काम किया था. इसने यह भी सुनिश्चित किया था कि सरकार जनकल्याणकारी राज्य के रूप में श्रमिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से पीछे न हट सके.


पीठ की एकमात्र महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने बहुमत के इस निष्कर्ष से पूरी तरह असहमति जताई कि 1978 का फैसला भविष्य में नए कानून के तहत किसी नजीर या मिसाल के तौर पर काम नहीं करेगा. 


उन्होंने 1880 के एक प्रसिद्ध अंग्रेजी कानूनी मामले (ग्रीव्स बनाम टोफील्ड) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब संसद का कोई नया कानून पुराने कानून की जगह लेता है और दोनों का विषय व उद्देश्य समान होता है, तो पुराने कानून पर दिए गए न्यायिक फैसले नए कानून की व्याख्या में प्रासंगिक और बाध्यकारी होते हैं.


जस्टिस नागरत्ना ने सचेत किया कि 1978 के फैसले की प्रासंगिकता को पूरी तरह खत्म करने का फैसला नए कानून (IRC) की धारा 2(p) के तहत उद्योग की परिभाषा को प्रभावित करेगा. उन्होंने बहुमत के समक्ष इस संदर्भ को खारिज करने का तर्क भी रखा, जिसे पीठ ने स्वीकार नहीं किया.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP