आदिवासी लड़कियों ने महिला आयोग से कहा- "हमें बदनाम किया गया"
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के दुर्ग रेलवे स्टेशन मामले में तीन आदिवासी लड़कियों ने बुधवार को राज्य महिला आयोग के सामने अपनी बात रखी. इन लड़कियों ने अपने परिवारों के साथ आयोग में उपस्थित होकर बताया कि वे स्वेच्छा से नौकरी की तलाश में बाहर जा रही थीं और ननों ने केवल उनकी मदद की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें घेरकर बदनाम किया गया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और मानसिक तनाव हुआ.
यह मामला 25 जुलाई को उस समय सुर्खियों में आया जब नारायणपुर की तीन आदिवासी लड़कियों (19-24 वर्ष की आयु) के साथ केरल की दो नन, प्रीति मेरी और वंदना फ्रांसिस, तथा एक आदिवासी पुरुष को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर सरकारी रेलवे पुलिस (जीआरपी) ने गिरफ्तार किया था.
यह कार्रवाई बजरंग दल के एक सदस्य की शिकायत पर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि ये लोग तीनों लड़कियों को जबरन धर्म परिवर्तन और तस्करी के लिए ले जा रहे थे.
इस घटना ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया. कांग्रेस और सीपीआई(एम) सहित विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक निशाना बनाने का आरोप लगाया, जबकि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे कानूनी कार्रवाई बताते हुए कहा कि सभी को जमानत मिल चुकी है.
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने स्टेशन पर ननों और लड़कियों को रोका था, जिसके बाद मामला तूल पकड़ गया. पुलिस जांच में कोई ठोस सबूत नहीं मिला, और बाद में कोर्ट ने गिरफ्तार लोगों को जमानत दे दी.
लड़कियों के वकील फूल सिंह कछलम ने 5 अगस्त को आयोग में याचिका दायर की थी.
उन्होंने कहा, "लड़कियों ने आयोग को बताया कि वे नौकरी के लिए स्वेच्छा से यात्रा कर रही थीं. ननों ने उनकी मदद की थी, लेकिन उन्हें घेरकर अपमानित किया गया. इस घटना ने उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया और मानसिक तनाव दिया."