नक्सल क्षेत्र में सुरक्षाकर्मियों की आत्महत्याएं, मानसिक स्वास्थ्य संकट गहराया
दंतेवाड़ा । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में तैनात अर्धसैनिक बलों (पैरामिलेट्री) के जवानों के बीच आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं ने मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं. यह दुखद सिलसिला फ्रंटलाइन सैनिकों की कल्याणकारी व्यवस्था पर खतरे की घंटी बजा रहा है.
सोमवार की सुबह, सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) की 231वीं बटालियन के एक कांस्टेबल का शव दक्षिण छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के गीदम इलाके में उनके क्वार्टर के अंदर फंदे से लटका मिला.
पुलिस ने बताया कि यह घटना सुबह करीब 5 बजे हुई. मृतक की पहचान उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के भवानीपुर के निवासी के रूप में हुई है. घटनास्थल की फॉरेंसिक टीम द्वारा जांच की गई है, और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है.
अधिकारियों ने कहा है कि मौत के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी गई है, हालांकि इस चरण में कारण स्पष्ट नहीं हैं. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने 'द स्टेट्समैन' को बताया, "प्राथमिक निष्कर्षों से कोई फॉल प्ले (अपराध) का संकेत नहीं मिलता है. विस्तृत रिपोर्ट से परिस्थितियों की पुष्टि होगी."
लगातार तीसरी घटना, मानसिक स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा
यह घटना हाल के महीनों में क्षेत्र से सामने आई दो अन्य त्रासदियों के बाद हुई है, जो उच्च तनाव वाले संघर्ष क्षेत्रों में तैनात कर्मियों के बीच उभरते मानसिक स्वास्थ्य संकट को उजागर करती है.
4 अगस्त को, छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (CAF) के प्लाटून कमांडर दिनेश चंदेल, जो भिलाई के निवासी थे, ने कथित तौर पर कोंडागांव जिले के बयनार कैंप के अंदर खुद को गोली मार ली थी. उनकी मौत की विभागीय जांच जारी है.
इस महीने की शुरुआत में, बिहार के भोजपुर जिले के सीआरपीएफ कांस्टेबल पप्पू यादव (29) बीजापुर के मिंगाचल में एक फॉरवर्ड कैंप में छुट्टी के बाद ड्यूटी पर लौटने के तुरंत बाद मृत पाए गए थे.
ये तीनों घटनाएं नक्सली विद्रोह से प्रभावित जिलों में हुई हैं, जहाँ लंबे समय तक तैनाती और अलगाव को संभावित तनाव कारक माना जाता है.
समीक्षा और समर्थन की मांग तेज़
इन लगातार हो रही मौतों ने भारत के केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) के भीतर मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण तंत्र की व्यवस्थित समीक्षा की मांगों को तेज़ कर दिया है.
दशकों से बस्तर में माओवादी विद्रोह को कवर कर चुके संघर्ष-क्षेत्र पत्रकार एस. करीमुद्दीन ने कहा, "हमारी सेना विद्रोह के खिलाफ शारीरिक लड़ाई जीत रही है, लेकिन भीतर की अदृश्य लड़ाई हार रही है. लंबे समय तक तैनाती के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है."
सुरक्षा विश्लेषकों का तर्क है कि सरकार को विद्रोह प्रभावित क्षेत्रों में तैनात कर्मियों के लिए गोपनीय परामर्श (कॉन्फिडेंशियल काउंसलिंग), नियमित रोटेशन और शिकायत निवारण को संस्थागत बनाना चाहिए.
एक वरिष्ठ गृह विभाग अधिकारी ने कहा कि कार्यस्थल पर तनाव के कारणों की पहचान करने और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को मजबूत करने के लिए आंतरिक मूल्यांकन चल रहे हैं.
अधिकारी ने जोड़ा, "हम अपने सैनिकों के प्रति ऋणी हैं कि हम उनकी भावनात्मक भलाई सुनिश्चित करें, ठीक वैसे ही जैसे हम उन्हें युद्ध के लिए तैयार करते हैं."