छत्तीसगढ़: चौथी की वार्षिक परीक्षा में भाषा पर बवाल
अंबिकापुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में आयोजित कक्षा चौथी की वार्षिक परीक्षा में भाषाई विसंगति का एक गंभीर मामला सामने आया है. सूरजपुर जिले में हिंदी के प्रश्न पत्र में क्षेत्रीय बोलियों के फेरबदल ने न केवल छात्रों को उलझन में डाल दिया है, बल्कि इसने नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के कार्यान्वयन और प्रश्न पत्र तैयार करने की प्रक्रिया पर भी बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं.
बीती 30 मार्च को आयोजित कक्षा चौथी की हिंदी परीक्षा में कुल 7 अंकों के तीन प्रश्न ऐसे पूछे गए थे, जो निर्धारित पाठ्यक्रम से बाहर के थे. दरअसल, सूरजपुर जिला सरगुजा संभाग के अंतर्गत आता है, जहाँ स्थानीय 'सरगुजिया' बोली के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार किया गया है. लेकिन, परीक्षा में जो सवाल पूछे गए, वे रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग जैसे मैदानी इलाकों की 'छत्तीसगढ़ी' बोली पर आधारित थे.
चिट्ठीदांड शासकीय प्राथमिक शाला के प्रधान पाठक गौतम शर्मा ने इस चूक को उजागर करते हुए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को पत्र लिखा है. उन्होंने बताया कि यह समस्या केवल सूरजपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा, कांकेर और जशपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों में भी यही स्थिति रही. नियमानुसार जहाँ बस्तर में 'हल्बी' और कांकेर में 'गोंडी' या 'कुड़ुख' भाषा में सवाल होने चाहिए थे, वहाँ मानक छत्तीसगढ़ी में प्रश्न पूछे गए, जिसे समझने में छोटे बच्चों को काफी कठिनाई हुई.
इस 'गोफ-अप' ने शिक्षा विभाग के भीतर ही दो फाड़ कर दिए हैं. प्रधान पाठक गौतम शर्मा का तर्क है कि यह चूक सीधे तौर पर नई शिक्षा नीति 2020 का उल्लंघन है, जो स्थानीय और मातृभाषा में शिक्षा देने की वकालत करती है. उन्होंने मांग की है कि इस त्रुटि के कारण छात्रों पर मानसिक दबाव पड़ा है, इसलिए उन्हें इन 7 अंकों के लिए ग्रेस मार्क्स दिए जाएं.
दूसरी ओर, विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के बयानों में विरोधाभास नजर आ रहा है. सूरजपुर डीईओ ने फिलहाल अन्य परीक्षाओं की व्यस्तता का हवाला देते हुए इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है, जबकि बस्तर संभाग के संयुक्त संचालक ने कहा है कि प्रश्न पत्र स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाते हैं और एनईपी में स्थानीय बोलियों में प्रश्न अनिवार्य होने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है.
कुड़ुख भाषा के विशेषज्ञ और लेखक रामेश्वर भगत ने इसे शिक्षा नीति के लिए एक बड़ा झटका बताया है. उन्होंने कहा कि जशपुर जैसे क्षेत्रों में 'कुड़ुख' को बहुभाषी शिक्षा के माध्यम के रूप में चुना गया था ताकि बच्चों की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहे.
ऐसे में मानक छत्तीसगढ़ी में सवाल पूछना उन बच्चों के साथ अन्याय है जो अपनी स्थानीय बोली में ही सहज हैं. अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग इस भाषाई विसंगति को सुधारने के लिए क्या कदम उठाता है.