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छत्तीसगढ़: आत्महत्या के मामलों में देश में चौथे स्थान पर

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10 सित. 2026, 01:58 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

फांसी लगाकर आत्महत्या
फांसी लगाकर आत्महत्या

रायपुर । संवाददाता: करियर का बढ़ता दबाव, पढ़ाई का तनाव, टूटते रिश्ते और सोशल मीडिया पर खुद को 'परफेक्ट' दिखाने की होड़ भारत की युवा पीढ़ी, खासकर 'जेन-जेड' की मानसिक स्थिति को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है. विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस (10 सितंबर) के अवसर पर सामने आए सरकारी आंकड़े और मनोचिकित्सकों के अध्ययन छत्तीसगढ़ की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं. 

आंकड़ों के मुताबिक, आत्महत्या के दर्ज मामलों में छत्तीसगढ़ देशभर में चौथे स्थान पर आ गया है, जिसमें सबसे ज्यादा प्रभावित युवा वर्ग हो रहा है.


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में वर्ष 2020 से 2024 के बीच अनुमानित 39,814 लोगों ने अपनी जान गंवाई. राज्य में 2020 में 7,710 और 2021 में 7,828 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2022 में बढ़कर 8,446 के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए. हालांकि 2023 में यह संख्या थोड़ी घटकर 7,868 हुई, लेकिन 2024 में 7,962 मामलों के साथ यह ग्राफ फिर ऊपर चढ़ गया.


छत्तीसगढ़ में आत्महत्या की दर प्रति एक लाख आबादी पर 26 है, जो 12.3 के राष्ट्रीय औसत से दोगुने से भी अधिक है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि राज्य के कुल मामलों में 34.6 प्रतिशत हिस्सेदारी 18 से 30 वर्ष के युवाओं की है, जिससे यह आयु वर्ग सबसे ज्यादा संवेदनशील साबित हो रहा है.


एम्स (AIIMS) रायपुर के अधिकारियों के अनुसार, टेली-मानस हेल्पलाइन (14416) पर आने वाले हर 10 में से 4 कॉल 18 से 28 वर्ष के युवाओं के होते हैं. इनमें से अधिकतर युवा गहरे अकेलेपन और अपनी बात सुनने वाला कोई न होने की शिकायत करते हैं. युवाओं से जुड़े कारणों के अलावा आर्थिक तंगी और सामाजिक परिस्थितियां भी इस संकट को बढ़ा रही हैं.


मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर पड़ते सामाजिक ताने-बाने और नशे की लत के कारण लोग अचानक आवेग में आकर ऐसे कदम उठा रहे हैं. राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आए मामले इस अनिश्चितता को दर्शाते हैं. कोरबा में एक महिला ने इंटरनेट बंद होने पर, दुर्ग में 10 साल के बच्चे ने डांट से आहत होकर और जांजगीर-चंपा में एक युवक ने झूठे पुलिस केस की धमकी से डरकर आत्मघाती कदम उठा लिया.


मनोचिकित्सकों ने जोर दिया है कि आत्महत्या को अपराध या मानसिक कमजोरी मानने के बजाय एक रोकथाम योग्य सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. उन्होंने परिवारों और समाज से अपील की है कि वे फैसला सुनाने के बजाय सहानुभूति दिखाएं और एक ऐसा सुरक्षित माहौल तैयार करें जहां तनावग्रस्त व्यक्ति खुलकर अपनी बात कह सके.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP