ननों को अस्पताल में भर्ती कराने का आश्वासन
दुर्ग । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के दुर्ग सेंट्रल जेल में बंद केरल की दो ननों, वंदना फ्रांसिस और प्रीता मैरी, जो अस्सीसी सिस्टर्स ऑफ मैरी इम्मैकुलेट से हैं को जिला अस्पताल में भर्ती कराने का वादा जेल प्रशासन ने किया है. यह जानकारी बुधवार (30 जुलाई, 2025) को जेल का दौरा करने वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रतिनिधिमंडल ने दी.
इन ननों को 25 जुलाई को दुर्ग रेलवे स्टेशन पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं द्वारा मानव तस्करी और जबरन धर्मांतरण के आरोप में भीड़ द्वारा घेरने के बाद गिरफ्तार किया गया था.
पुलिस ने ननों पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 143 और छत्तीसगढ़ धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 1968 की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया है, जिसमें 10 साल तक की सजा और कम से कम 2 लाख रुपये के जुर्माने का प्रावधान है.
लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट प्रतिनिधिमंडल में शामिल नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमन की महासचिव एनी राजा ने बताया कि ननों को जेल में कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है.
एक नन को गठिया की समस्या है, फिर भी उन्हें फर्श पर सोना पड़ता है. उनकी नियमित दवाइयों तक भी पहुंच नहीं है. एनी राजा ने बताया कि ननों ने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं द्वारा रेलवे स्टेशन और थाने में किये गये शारीरिक और मौखिक उत्पीड़न की घटनाओं का दुखद ब्यौरा दिया.
दूसरी ओर, कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ननों की जमानत के लिए दुर्ग के जिला सत्र न्यायालय में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहा है.
लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट प्रतिनिधिमंडल ने तीन महिलाओं, जिनमें एक आदिवासी भी थी, से मुलाकात करने की कोशिश की, जो ननों के साथ यात्रा कर रही थीं. हालांकि, स्थानीय प्रशासन ने इन महिलाओं को नारायणपुर भेज दिया है.
प्रतिनिधिमंडल ने पुरुष जेल में बंद एक आदिवासी, सुभूमन मांडव से मुलाकात की, जिन पर "आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिलाओं को धर्मांतरण के लिए लुभाने" का आरोप है.
केरल कांग्रेस (एम) के अध्यक्ष जोस के. मनी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को मांडव पर हमला करने की छूट दी.
उन्होंने यह भी दावा किया कि कार्यकर्ताओं ने तीनों महिलाओं को जबरन बयान बदलने के लिये दबाव डाला, जिसमें उन्होंने कहा था कि वे स्वेच्छा से और अपने माता-पिता की लिखित सहमति से ननों के साथ थीं.
मनी ने कहा, "भाजपा शासित राज्यों में ईसाइयों में डर का माहौल है. छत्तीसगढ़ में नन और पादरी अपने धार्मिक परिधान पहनने या अपने समुदाय के लोगों से मिलने से डरते हैं."