'बिना पेनेट्रेशन के बलात्कार नहीं': छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि यौन हमले के दौरान 'पेनेट्रेशन' साबित नहीं होता है, तो उसे बलात्कार के बजाय 'बलात्कार का प्रयास' माना जाएगा. न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने धमतरी जिले के 20 साल पुराने एक मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी की सजा को सात साल से घटाकर साढ़े तीन साल कर दिया है.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत बलात्कार का अपराध सिद्ध करने के लिए 'पेनेट्रेशन' एक अनिवार्य शर्त (sine qua non) है, जबकि केवल स्खलन (ejaculation) को वास्तविक बलात्कार नहीं माना जा सकता.
यह मामला 21 मई 2004 का है, जहाँ एक महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी उसे बहला-फुसलाकर अपने घर ले गया और उसके साथ जबरदस्ती की.
निचली अदालत ने 2005 में आरोपी को धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल की कैद सुनाई थी.
हालांकि, हाई कोर्ट ने पीड़िता के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों में विरोधाभास पाया. पीड़िता ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में केवल आंशिक प्रवेश की संभावना जताई थी, वहीं डॉक्टर की रिपोर्ट भी इस पर स्पष्ट राय देने में विफल रही.
कोर्ट ने माना कि साक्ष्य यौन हमले की पुष्टि तो करते हैं, लेकिन कानूनी मापदंडों के अनुसार बलात्कार साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. इसके परिणामस्वरूप, अदालत ने धारा 376 को संशोधित कर धारा 511 (बलात्कार का प्रयास) में बदल दिया.