छत्तीसगढ़ HC: भावना नहीं, ठोस सबूतों से होगा न्याय, रेप का आरोपी बरी
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि न्यायिक फैसलों में भावनाओं का स्थान नहीं होता और केवल सहानुभूति के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत 20 साल की कड़ी सजा काट रहे एक व्यक्ति को दोषमुक्त करते हुए उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है.
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए इसे 'न्याय की गंभीर चूक' करार दिया और कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत जबरन अपहरण के नहीं, बल्कि आपसी सहमति से बने संबंधों की ओर इशारा करते हैं.
यह पूरा मामला अप्रैल 2022 में शुरू हुआ था, जब छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति ने अपनी 15 वर्षीय नाबालिग बेटी के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. पुलिस जांच के दौरान लड़की हैदराबाद में आरोपी युवक के साथ मिली थी.
इसके बाद पुलिस ने युवक पर अपहरण और दुष्कर्म की धाराओं के साथ-साथ पोक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया. दिसंबर 2023 में निचली अदालत ने युवक को दोषी मानते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से जांच करने पर पाया कि लड़की अपनी मर्जी से युवक के साथ गई थी और दोनों हैदराबाद में शांतिपूर्वक पति-पत्नी की तरह रह रहे थे. कोर्ट ने पीड़िता के बयानों में बड़े विरोधाभास पकड़े. लड़की ने एक बार कहा कि उनकी शादी हो चुकी थी और फिर शारीरिक संबंध बने, जबकि बाद में उसने कहा कि कोई शादी नहीं हुई थी.
अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही 'ठोस और अटूट' होनी चाहिए, लेकिन इस मामले में बयानों के बदलाव ने मामले की नींव को ही कमजोर कर दिया.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार लड़की की सही उम्र और जबरदस्ती के आरोपों को बिना किसी संदेह के साबित करने में नाकाम रही है. अंत में अदालत ने यह सिद्धांत दोहराया कि यदि सबूतों में किसी भी प्रकार का संदेह या दो अलग-अलग पक्ष नजर आते हैं, तो उसका लाभ हमेशा आरोपी को ही मिलना चाहिए.