HC: हिंदू रीति-रिवाज मानने वाले आदिवासियों पर लागू होगा हिंदू विवाह अधिनियम
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि अनुसूचित जनजाति का कोई सदस्य स्वेच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों, परंपराओं और संस्कारों को अपनाता है, तो उसे हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता. न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए एक पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक दंपत्ति की आपसी सहमति से तलाक (Section 13B) की याचिका को केवल इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि पति अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित है.
पूरा मामला वर्ष 2009 का है, जब एक आदिवासी पुरुष और एक गैर-आदिवासी महिला का विवाह हिंदू रीति-रिवाजों और सात फेरे की रस्म के साथ संपन्न हुआ था. वैवाहिक विवादों के कारण जब दोनों ने आपसी सहमति से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन किया, तो निचली अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2(2) का हवाला देते हुए याचिका खारिज कर दी थी, जो कहती है कि यह अधिनियम अधिसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता.
उच्च न्यायालय ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि धारा 2(2) आदिवासियों के लिए एक 'संरक्षण' का उपाय है, न कि उन्हें कानूनी अधिकारों से 'बेदखल' करने का जरिया. न्यायालय के अनुसार, यदि कोई आदिवासी सदस्य स्वेच्छा से हिंदू धर्म के सिद्धांतों को स्वीकार करता है और यह सिद्ध होता है कि वे हिंदूकृत हो चुके हैं, तो वे अपनी मर्जी से इस कानून के तहत न्याय मांगने के हकदार हैं.
अदालत ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि हिंदू कानून के तहत विवाह केवल एक नागरिक अनुबंध नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार है. चूंकि इस मामले में दंपत्ति ने स्वयं को हिंदू बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था, इसलिए उन्हें पारंपरिक आदिवासी अदालतों में वापस नहीं भेजा जा सकता.
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 13(3)(a) और अनुच्छेद 342 के संदर्भ में कहा कि आदिवासियों की अपनी प्रथाओं और कानूनों को संरक्षित किया गया है, लेकिन यदि वे स्वेच्छा से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 के तहत विवाह करते हैं, तो उन्हें इस अधिनियम के दायरे से बाहर रखना अनुचित होगा.
इस ऐतिहासिक आदेश के साथ ही उच्च न्यायालय ने मामले को वापस पारिवारिक न्यायालय भेज दिया है और निर्देश दिया है कि आपसी सहमति से तलाक की इस अर्जी पर कानून के अनुसार शीघ्र और गुण-दोष के आधार पर फैसला लिया जाए.