HC: शिक्षा कर्मियों को स्कूल शिक्षा विभाग के समान वेतनमान और लाभ नहीं
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पंचायत नियमों के तहत कार्यरत रहे शिक्षा कर्मी, स्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों के लिए निर्धारित वेतनमान या अन्य लाभों के हकदार नहीं हैं. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने मंगल राम उसेन्डी व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया.
अदालत ने साफ तौर पर कहा कि पंचायत विभाग के अधीन की गई सेवा को स्कूल शिक्षा विभाग के तहत की गई सेवा के समकक्ष नहीं माना जा सकता.
यह मामला उन शिक्षा कर्मियों से जुड़ा था जिनकी नियुक्ति ज़िला पंचायतों द्वारा की गई थी और बाद में उन्हें स्कूल शिक्षा विभाग में समाहित (absorb) किया गया था.
अपीलकर्ताओं ने राज्य सरकार के 10 मार्च 2017 के उस परिपत्र के आधार पर 'क्रमोन्नति वेतनमान' (समयबद्ध वेतन वृद्धि) की मांग की थी, जो सरकारी कर्मचारियों को 10 और 20 वर्ष की सेवा पूरी करने पर लाभ प्रदान करता है.
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि उक्त परिपत्र नियमित सरकारी शिक्षकों के लिए है, न कि पंचायत संवर्ग के शिक्षा कर्मियों के लिए, जिनकी सेवा शर्तें 'छत्तीसगढ़ पंचायत शिक्षा कर्मी (भर्ती और सेवा की शर्तें) नियम, 2007' द्वारा शासित होती हैं.
कोर्ट ने पूर्व के 'श्रीमती सोना साहू' मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि उस मामले में याचिकाकर्ता की नियुक्ति सीधे सरकारी शिक्षक के रूप में हुई थी, जबकि वर्तमान अपीलकर्ता पंचायत विभाग के कर्मचारी थे, इसलिए उन्हें समानता के आधार पर लाभ नहीं दिया जा सकता. खंडपीठ ने एकल पीठ के पिछले निर्णय को सही ठहराते हुए इस अंतर-न्यायालय अपील को खारिज कर दिया.