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छत्तीसगढ़ में वन अधिकार पर सरकारी आदेश के ख़िलाफ़ सड़क पर आदिवासी

छत्तीसगढ़ में वन अधिकार खतरे में?

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02 जुल. 2025, 03:44 PM 4 मिनट में पढ़ें 1

विरोध प्रदर्शन
विरोध प्रदर्शन

रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ में वन विभाग के एक आदेश के खिलाफ 1 और 2 जुलाई को हजारों लोगों ने राज्य भर में प्रदर्शन किया. यह आदेश वन अधिकार अधिनियम (FRA 2006) और ग्राम सभाओं के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने वाला है.


यह आंदोलन प्रदेश के अनेक जिलों-धमतरी, नारायणपुर, गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही, अम्बिकापुर, कांकेर, गरियाबंद, पिथौरा (महासमुंद), बालोद और बस्तर-में स्थानीय ग्राम सभाओं, आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से आयोजित किया गया.


वनाधिकार और आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बताया कि 15 मई 2025 को छत्तीसगढ़ वन विभाग द्वारा जारी पत्र के माध्यम से वन विभाग ने स्वयं को FRA का नोडल विभाग घोषित करने का प्रयास किया, जो कि पूर्णतः अवैध एवं आदिवासी विकास विभाग के अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है. इससे भी आगे जाकर, विभाग ने अपने राष्ट्रीय वर्किंग प्लान संहिता 2023 के जरिये जंगलों के वैज्ञानिक प्रबंधन की दुहाई देकर, ग्रामसभाओं और अन्य विभागों के द्वारा समर्थित सामुदायिक वन संसाधन को रोकने की धमकी दी है. विभाग के इस प्रयास से प्रदेश के करीब 20 हजार वर्ग किमी के जंगलों पर समुदाय का नियंत्रण एवं प्रबंधन खतरे में पड़ गया है. इसके खिलाफ पिछले दो दिनों में प्रदेश के विभिन्न जिलों एवं आदिवासी अंचलों में हजारों लोगों ने स्वस्फूर्त रैलियाँ निकालीं और जिलाधिकारियों के माध्यम से मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नाम ज्ञापन सौंपा .


धमतरी जिले के नगरी क्षेत्र में लगभग 500 ग्राम सभा प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन किया. उन्होंने आरोप लगाया कि वन विभाग की मंशा CFR (सामुदायिक वन संसाधन अधिकार) प्रबंधन की प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर ग्राम सभा की निर्णयात्मक भूमिका को समाप्त करना है.


इसी तरह गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही में सर्व आदिवासी समाज और ग्रामसभा फेडरेशन के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा. 


इसी कड़ी में बालोद जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक के मंगचुवा क्षेत्र की महा ग्राम सभा द्वारा भी कलेक्टर के माध्यम से विरोध दर्ज कराया गया.


ज्ञापन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि 15 मई 2025 को जारी आदेश न केवल वनाधिकार कानून की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि यह संविधान में अनुसूचित क्षेत्रों के लिए प्रदत्त विशेष प्रावधानों-जैसे पेसा कानून, पाँचवीं अनुसूची, और ग्रामसभा के निर्णयों की सर्वोच्चता, का भी सीधा उल्लंघन है. यदि वन विभाग अपनी भूमिका से बाहर जाकर ग्रामसभाओं को उनके अधिकारों से वंचित करेगा, तो इससे न केवल वन प्रबंधन की लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित होगी, बल्कि इससे जलवायु अनुकूल वन प्रशासन, स्थानीय जैव विविधता का संरक्षण, और वन आधारित आजीविकाओं पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा.


ज्ञापन में कहा गया है कि वन विभाग को चाहिए कि वे वन आश्रित समुदायों के अधिकार में बाधा न डाल कर, प्रदेश में शेष बचे 8 हजार वन-आश्रित गाँव की ग्रामसभाओं को सामुदायिक वन अधिकार प्राप्त करने में सहयोग करें.  


ज्ञापन में यह भी गंभीर चिंता जताई गई है कि इस आदेश के चलते आदिवासी बहुल ग्रामसभाओं की वन प्रबंधन योजनाएँ अमान्य घोषित हो जाएँगी, जिससे वन विभाग को एकतरफा निर्णय लेने का अधिकार मिल जाएगा. इससे आगे चलकर खनन, ग्रीन एनर्जी व बायोफ्यूल इंडस्ट्री, कार्बन क्रेडिट परियोजनाएं, और मोनोकल्चर प्लांटेशन को ग्रामसभा की सहमति के बिना थोपे जाने का रास्ता साफ हो जाएगा. इससे ग्रामसभा की निर्णय लेने की क्षमता, लोकतांत्रिक संरचना, और स्थानीय समुदायों की पहचान और आत्मनिर्भरता पर गहरा खतरा उत्पन्न हो सकता है.


इस राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन में सैकड़ों ग्रामसभा प्रतिनिधि, वन अधिकार कार्यकर्ता, आदिवासी युवजन, महिला समितियाँ, और विभिन्न सामाजिक संगठनों की भागीदारी रही. 


इन रैलियों के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट किया गया कि वनाधिकार कानून केवल सरकारी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह जंगलों पर ऐतिहासिक अन्याय का न्यायपूर्ण समाधान है, जिसे किसी भी हालत में कमजोर नहीं होने दिया जाएगा.


संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस आदेश को तत्काल निरस्त नहीं किया और आदिवासी विकास विभाग को नोडल एजेंसी बनाए रखने की लिखित घोषणा नहीं की, तो पूरे प्रदेश में जन-जागरण अभियान, सत्याग्रह, और विधानसभा घेराव तक की रणनीति बनाई जाएगी. ग्रामसभा अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित, शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से आंदोलन जारी रखेंगी..

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP