बिलासपुर: ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल में फर्जी CBSE मान्यता, 300 बच्चों का भविष्य अधर में
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ शहर के प्रतिष्ठित 'ब्रिलियंट पब्लिक स्कूल' द्वारा वर्षों से चलाए जा रहे फर्जीवाड़े ने सैकड़ों मासूम बच्चों के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा दिए हैं. खुद को CBSE संबद्ध बताकर भारी-भरकम फीस वसूलने वाले इस स्कूल की पोल तब खुली जब छत्तीसगढ़ सरकार ने इस शैक्षणिक सत्र (2026) से कक्षा 5वीं और 8वीं के लिए राज्य बोर्ड की परीक्षाएं अनिवार्य कर दीं.
इस खुलासे के बाद लगभग 300 छात्र 16 मार्च से शुरू होने वाली छत्तीसगढ़ बोर्ड की परीक्षाओं में बैठने से वंचित रह गए हैं. जांच में पता चला है कि स्कूल की दो शाखाएं राज्य बोर्ड की मान्यता का दुरुपयोग कर रही थीं और उन्होंने कभी भी आधिकारिक तौर पर CBSE से संबद्धता प्राप्त ही नहीं की थी.
अभिभावकों को अंधेरे में रखकर स्कूल प्रबंधन ने पूरे साल बच्चों को CBSE के पाठ्यक्रम से पढ़ाया, जबकि कानूनी तौर पर यह संस्थान राज्य बोर्ड के नियमों के अधीन था.
हैरानी की बात यह है कि स्कूल के पास केवल कक्षा 8वीं तक की राज्य बोर्ड की मान्यता थी, लेकिन एक ही मान्यता प्रमाण पत्र का उपयोग कर दो अलग-अलग परिसर चलाए जा रहे थे. जब अंतिम समय पर स्कूल ने अभिभावकों से CBSE पैटर्न और छत्तीसगढ़ बोर्ड परीक्षा के बीच चुनाव करने को कहा, तब जाकर इस बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ.
जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा की गई आपातकालीन जांच में स्कूल को दोषी पाया गया है और उसकी मान्यता रद्द करने की सिफारिश की गई है.
इस बीच, पीड़ित छात्रों के अभिभावकों ने बच्चों को राज्य बोर्ड की परीक्षा में बैठाने से इनकार कर दिया है, क्योंकि बच्चों ने साल भर CBSE की किताबें पढ़ी थीं और वे अचानक बदले हुए पाठ्यक्रम के लिए तैयार नहीं थे. अधिकारियों ने अब इन बच्चों के लिए जून-जुलाई में पूरक परीक्षा आयोजित करने का विकल्प सुझाया है.
इसी तरह का एक और मामला नेहरू नगर स्थित नारायण टेक्नोक्रेट्स स्कूल में भी सामने आया है, जिसने बिना किसी वैध मान्यता के पूरे साल CBSE के नाम पर कक्षाएं संचालित कीं. शिक्षा विभाग की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर वर्षों तक यह फर्जीवाड़ा अधिकारियों की नजरों से कैसे बचा रहा.
चर्चा है कि निरीक्षण के दौरान 'लेन-देन' और राजनीतिक दबाव के चलते इन स्कूलों पर कभी कार्रवाई नहीं हुई.
फिलहाल, जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस संकट का समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इस घटना ने निजी स्कूलों की मनमानी और नियामक संस्थाओं की सुस्ती को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है. अब देखना यह होगा कि क्या इन धोखाधड़ी करने वाले संस्थानों और भ्रष्ट अधिकारियों पर कोई कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होती है या नहीं.