कैपेक्स रिपोर्ट: छत्तीसगढ़ बजट का पूरा पैसा खर्च करने में रहा पीछे
नई दिल्ली । डेस्क: देश के राज्यों में विकास कार्यों की रफ्तार को लेकर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) के ताजा आंकड़े सामने आ गए हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 (FY26) में पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure या कैपेक्स) के मामले में छत्तीसगढ़ समेत कई भाजपा शासित राज्य अपने बजटीय अनुमान (Budget Estimate) को हासिल करने में पीछे छूट गए हैं. हालांकि, छत्तीसगढ़ ने पिछले साल के मुकाबले अपने प्रदर्शन में मामूली सुधार दर्ज किया है और वह पड़ोसी राज्य राजस्थान और पूर्वोत्तर के राज्यों से बेहतर स्थिति में है.
छत्तीसगढ़ का प्रदर्शन: मामूली सुधार, पर उम्मीदें अब भी बाकी
कैग (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ सरकार वित्तीय वर्ष 2025-26 में अपने कुल 26,341 करोड़ रुपये के पूंजीगत व्यय (BE) का केवल 57.12 प्रतिशत ही विकास कार्यों पर खर्च कर सकी है. हालांकि, यह आंकड़ा पिछले वित्तीय वर्ष (FY25) के 55.10 प्रतिशत के मुकाबले थोड़ा बेहतर है, लेकिन बजटीय लक्ष्य के लिहाज से इसे अब भी कमजोर माना जा रहा है. इसका सीधा मतलब यह है कि बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आवंटित एक बड़ी राशि इस साल भी बिना खर्च हुए रह गई.
पूंजीगत व्यय (Capex) वह धन होता है जिसे सरकारें सड़कों, स्वास्थ्य सुविधाओं, स्कूलों और अन्य बुनियादी ढांचों (Infrastructure) के निर्माण और अपग्रेडेशन पर खर्च करती हैं, जिससे रोजगार और आर्थिक विकास को गति मिलती है.
अन्य राज्यों की तुलना: राजस्थान पछाड़ा, पूर्वोत्तर की हालत ज्यादा पतली
छत्तीसगढ़ के मुकाबले अन्य भाजपा शासित राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो राजस्थान में भारी गिरावट देखी गई है. राजस्थान का कैपेक्स उपयोग वित्तीय वर्ष 2024-25 के 74.87 प्रतिशत से घटकर इस साल महज 51.82 प्रतिशत (56,327.33 करोड़ रुपये के बजट में से) पर आ गया.
वहीं, पूर्वोत्तर के राज्यों की स्थिति और भी खराब रही:
अरुणाचल प्रदेश: अपने 8,842 करोड़ रुपये के बजट का केवल 39.64 प्रतिशत ही खर्च कर पाया.
मणिपुर: जातीय हिंसा से जूझ रहे इस राज्य ने पिछले साल (25.25%) के मुकाबले सुधार करते हुए 47.56 प्रतिशत खर्च किया, जो कि बजट का आधे से भी कम है.
विपक्षी दलों के राज्यों में भी कैपेक्स की चाल धीमी
कम खर्च की यह समस्या केवल भाजपा शासित राज्यों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गैर-भाजपा राज्यों में भी विकास की रफ्तार सुस्त दिखी. हाल ही में तृणमूल कांग्रेस को हराकर भाजपा की नई सरकार का गवाह बने पश्चिम बंगाल ने इस अवधि में अपने 39,337.74 करोड़ रुपये के बजट का सिर्फ 48 प्रतिशत खर्च किया, जो पिछले साल के 60.40 प्रतिशत से काफी कम है. इसके अलावा झारखंड (JMM-कांग्रेस गठबंधन) ने 50.72 प्रतिशत और मिजोरम ने देश में सबसे कम 34.57 प्रतिशत कैपेक्स उपयोग दर्ज किया.
आखिर क्यों नहीं खर्च हो पाता विकास का पैसा?
बजट अनुमानों के मुताबिक खर्च न हो पाने के कारणों को समझाते हुए वित्त आयोग के पूर्व सदस्य गोविंद राव ने बताया कि कई बार राज्य सरकारें राजस्व (Revenue) का अनुमान जरूरत से ज्यादा लगा लेती हैं. बाद में जब उन्हें पता चलता है कि वास्तविक कमाई कम है, तो वे खर्चों में कटौती करने पर मजबूर हो जाते हैं.
चूंकि सरकारें वेतन, भत्ते और ऋण भुगतान जैसी प्रतिबद्ध देनदारियों (Committed Liabilities) को नहीं काट सकतीं, इसलिए सबसे पहला कट 'कैपेक्स' यानी विकास कार्यों के बजट पर ही चलता है. इसके अलावा अचानक से किसी अन्य मद में राजस्व खर्च बढ़ जाने से भी राज्यों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं.
कांग्रेस शासित राज्यों ने मारी बाजी: तेलंगाना और कर्नाटक सबसे आगे
इस रिपोर्ट में सबसे चौंकाने और सराहनीय प्रदर्शन कांग्रेस शासित राज्यों का रहा है. तेलंगाना इस सूची में शीर्ष पर रहा, जिसने अपने 36,504.45 करोड़ रुपये के बजटीय अनुमान से कहीं अधिक 147.58 प्रतिशत राशि बुनियादी ढांचे पर खर्च कर दी. वहीं कर्नाटक ने भी 102.46 प्रतिशत (68,172.24 करोड़ रुपये) का शानदार आंकड़ा छुआ. हिमाचल प्रदेश भी 96.73 प्रतिशत के साथ शीर्ष प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल रहा. पूरे देश में केवल तीन राज्य तेलंगाना, कर्नाटक और नगालैंड (140.14%) ही ऐसे रहे जिन्होंने 100% से अधिक कैपेक्स उपयोग दर्ज किया है.